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<title>هیــــــــچ شعری شاعر ندارد. پابلو نرودا</title>
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<description>هیچ شعری شاعر ندارد..هر خواننده ی شعری .. شاعر آن لحظه شعر است..پابلو نرودا</description>
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<lastBuildDate>Sat, 17 Oct 2009 22:32:18 GMT</lastBuildDate>
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<link>http://shararehaye-divanegi.blogfa.com/post-46.aspx</link>
<description>  
&lt;P&gt;&lt;A href=&quot;http://www.nasour.net/?type=dynamic&amp;lang=1&amp;id=512&quot;&gt;بازخوانی زندگی و اندیشه هرتا مولر :: شراره جمشید&lt;/A&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;مندرج در ماهنامه ی تدبیر فردا شماره ی ۱۸&lt;/P&gt;
&lt;P&gt; &lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Sat, 17 Oct 2009 22:32:18 GMT</pubDate>
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<dc:creator>shararehaye-divanegi</dc:creator>
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<title>4 شعر . شــــــــــراره جـــمــشـــيـــد</title>
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<description>&lt;P align=justify&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt; &lt;A href=&quot;http://rahoo-9.blogfa.com/&quot;&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT color=#ff0000&gt;انجمن( مجازی) جمعی از شاعران معاصر ایران&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/A&gt; کلیک کنید .&lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt;۱&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;تنديـــس  ِ بــومــي  ِ وجودم&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;تــَــه ِ غار تنهاســـــت&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;بيا به شــــــكــار ِ من&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;به لمــس  ِ ديــواره هــاي وجــودم&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;نيــمــه ي  خــُــفته ام&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;بــوسه مــي خواهد  . . .&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt;۲&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;در دور دست ِ چـــشـــــــم ِ مرطــوبم&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;پشت شمشـــادهــا&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;برايــــم چاي مــي ريــزي &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;من در ايـــوان&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;ناخــُــن مي جــَوَم&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;ميل به شــانه هات&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;سوگوارم مي كند   .&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt;۳&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;ديــگر گـــُل  نمي فروشد&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;گــــوش بچسبان بـــه ديـــوار&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;صداي فقر ،  با دامنش بالاست .&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;آخرين متروي شب  كه رفت&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;فاحشه اي جوان&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;غنچه ها را دلتنگ بود  .&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt;۴&lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;معلق در حجــم  ِ ابري ِ خاكـــــــــستري&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;خـــــيــــــــال بــــــال&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;پروازش مي داد&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;يـــــــك پــُـك تا سقوط&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;پــلـــكــش را خواباند  . &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;نويسنده : شــــــــــراره جـــمــشـــيـــد&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;/STRONG&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;/STRONG&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;STRONG&gt;سعید نورالهی . تراما&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;سلام خانم جمشید&lt;BR&gt;خوندمتون و باید بگم که:کار اول ذهنم را قفل کرد بارها و بارها خواستم به &quot;لمس دیواره های وجود &quot; اعتراض کنم و بگم که کار رو طولانی کرده .و حیفم اومد دیدم که شعر رو ناقص می کنه و بارها وبارها خواستم بگم که &quot;تندیس بومی وجودم&quot; ترکیب بلند و سنگینیه واسه یه کار کوتاه و اونم حیفم اومدوووپس تصمیم گرفتم که همین باشد که شما گفته اید ..پس کار کار پخته ایست که دست بر هیچ جای ان نتوان برد.&lt;BR&gt;کار دوم:&lt;BR&gt;و به این میگم یه طرح...از ادبیات هیچی نمی دونم و تعریف شعر و غیر شعر و طرح و هایکو و سپید کوتاه رو هم نمی دونم ولی طرح رو در رگ و روح این کار پیدا کردم.من به این کار می گم طرح مفهومی ونه طرح تصویری...&lt;BR&gt;کاراتون تا اینجا شروعهای سختی داشتند&quot;در دوست چشم مرطوبم&quot; جایی نزدیکتر نمی توان منتظر بود؟ این در مورد کار اول هم صادقه&quot;شروع سخت&quot;&lt;BR&gt;کار سوم&lt;BR&gt;هم زیبا بود و اگر چه موضوعی تکراری داشت همیشه دوستان این دختر بدبخت کبریت فروش یا گل فروش رو به کجاها که نمی برند....ولی دو سطر اخرش خیلی برام دلچسب بود.&lt;BR&gt;کارچهارم:&lt;BR&gt;ببخشید این رو می گم ولی کار چهارم بد بود ... وقتی نویسنده ای کاری رو در آخر پستش میاره این خوادش نشان از عدم دلبستگی نویسنده به شعر رو نیز بیان میکنه ولی من به این توجهی نمی کنم ..خودم برام سخت بود که این شعر رو درک کنم و وقتی که درکش کردم ازش لذت نبردم و نتونستم در حد و اندازه ی بالایی ها دوستش داشته باشم و بپذیرمش...&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;STRONG&gt;نادر امیر آبادی&lt;/STRONG&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;با سلام و عرض ارادت هميشگي خدمت خانم جمشيد &lt;BR&gt;شعر اول به نظرم با بينش و شگرد خاصي نوشته شده است .تمام عناصر شعر از نشانه&lt;BR&gt;و درون مايه و ديگر ابعاد مبناي ويژه اي دارد . انگار يك معصوميت بكر و دست نخورده ي&lt;BR&gt;باستاني را مي خواد به ياد بياورد . كه اگر به نوستالژي و روان انساني ربطش دهيم &lt;BR&gt;يك اشتراك معنايي هم ، رو مي شود وهمان حس ِ خود را جايي / جا گذاشتن است و انتظار تلنگري براي به خود آمدن . من خيلي از اين شعر لذت بردم .&lt;BR&gt;شعر دوم باز يك رجعت است به خاطره اي شخصي يا شباهتي به يك روياي دست نيافتني . كه با لطافت&lt;BR&gt;به آن پرداخته ايد .هم از بابت حس دلتنگي و هم از سوي تنش و اضطراب و شكل يك انتظار سخت .&lt;BR&gt;شعر سوم همان قصه ي هميشگي ست . قصه اي كه به نوعي ديگر تكرار شده است ولي اگر بر مبناي يك واقعيت ملموس اجتماعي نگاهش كنيم مي بينيم اين تكرار آسيبي نمي رساند به دوباره نوشتن از موضوعي تكراري و روزمره . انتهايش جالب بود . نسبت غنچه و گل با نسبت دختر و زنانگي بسيار هماهنگي دارد .&lt;BR&gt;شعر چهارم هم كه باز به موضوعي اجتماعي نگاه مي كند . شايد بهتر از اين مي شد پايانش را تنظيم كرد .&lt;BR&gt;&lt;/P&gt;&lt;/SPAN&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;/SPAN&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt; &lt;SPAN class=author&gt;&lt;STRONG&gt;تاویر&lt;/STRONG&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;بسیار زیباست این سروده ها&lt;BR&gt;تراژدی سقوط به نسیم مژه برهم زدنی&lt;BR&gt;صدای فقر با دامنش بالاست دیگر گل نمی فروشد زیرا گلهایش پژمرده اند تازه خریدار هم ندارند باید در تکاپوی رنگ باختن شراب کهنه ای باشد که سالها در اندرون حجب پناهش داده بود. دوست ندارم گوشم را به دیوار بچسبانم چون از صدای فقر شرم دارم&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;STRONG&gt;کامران مهاجر&lt;/STRONG&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;شعر نخست خروش جوانی را به یادم می آورد. آن هنگام که به معشوق احساس سرکشی داری. سرکشی سرشار از شهوت و زیبایی. آن هنگام که تنها چراغ روشنایی در خاموشی فراگیر هستی. آن هنگام که ترسی نیست از برای ابراز وجود واقعی، چرا که شور عشق تمام وجودت را در بر گرفته است.&lt;BR&gt;فرار از برای چه وقتی &quot;ماندن&quot; تنها روشنایی موجود است؟ تصویری که چشمانم را می گشاید و یادآور می شود بینایم. ترکیبات زیبا و واژگان کلیدی مرا با خود می برند به اوج خروش جوانی، همانی که تا آخرین لحظهء وجودم اینچنینی ام با من است: &quot;تندیسِ بومی، غار، شکار، لمس دیواره های وجود، نیمهء خفته که یادآوری آن لبخندی پیروزمندانه بر لبانم نقش می آفریند و بوسه. بوسه همراه نفسهای جوانی، ته غار بر نیمهء خفته. &lt;BR&gt;لذت بردم.&lt;BR&gt;...!شعر دوم سیلی می زند. آری دریافتم، زندگی یعنی درک درد در اوج عشق و کامجویی.&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;این شعر کوتاه آرام و دلنواز آغاز می شود و در پایان سوگواری را یادآور. بی رحم است. شعر راهی نشان نمی دهد، لبخندی نمی زند. ترحمی ندارد. باشد، درد می کشم، اما بدان سوگوار نخواهم بود!&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;شعر سوم پرده دری را با شدت بیشتر دنبال می کند و گویا یاد آور این است که روشنایی اگرچه بینایی را به تو ارزانی می دارد اما توانایی درک واقعیتهای تلخ و دردناک را نیز بالا می برد.&lt;BR&gt;شعر چهارم ضربهء نهایی را می زند:&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&quot;پلکش را خواباند.&quot;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;حال باز هم به دنبال لبخندی؟ پاسخم این است: آری با لبخند پلک روی پلک می گذارم.&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;STRONG&gt;خانم محمدی / یازگل&lt;/STRONG&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;در اول حرفام مي خوام بگم كه يه تفاوت بسيار عظيم رو حس كردم .&lt;BR&gt;اين دفعه از مرگها نگفته ايد . منظورم عزيزانتون هست . هميشه لااقل&lt;BR&gt;يكي از شعرا رو يه جوري به اون غم عظيم ربط مي داديد . و منم هميشه&lt;BR&gt;با بغض مي خواندمشون . حالا بريم سراغ اين شعراتون . &lt;BR&gt;شعر اول : خيلي زياد به دلم نشست . خيلي زاويه نگاهتون و بعد احساسي شعر&lt;BR&gt;برام جالبه . از چند طرف در من اثر داشت . يكي از بعد تصويري و يك فضاي&lt;BR&gt;شفاف كه هم برام انساني رو تداعي مي كرد كه نيازمند مهربوني هستش و اينو داره&lt;BR&gt;در جايي مي گه كه نقطه اي براي پژواك و انعكاس هستش . يعني غار . از بعد ديگه&lt;BR&gt;به داستان بچگيها يعني همون زيباي خفته برگشتم كه سحر و جادوي دختر قصه با يه بوسه&lt;BR&gt;باطل مي شد . از طرف ديگه در تماميت شعر يه بعد ديگه هم براي من وجود داشت . يك احساس مبهم&lt;BR&gt;كه مي خواد به من مخاطب بگه اين ابهام مربوط به احساس خود نويسنده ي اين خطوطه و من خواننده&lt;BR&gt;نمي تونم درش سهمي داشته باشم . شعر دومي هم تصوير خاصي كه لبريز از عاطفه و عشق و تنهايي&lt;BR&gt;و انتظار رو برام شبيه سازي مي كرد و واكنشي از استرس كه در جويدن ناخنها خودش رو جا مي داد .&lt;BR&gt;يه غربت خاصي در اين شعر بود . وباز يه نگاه شخصي به تنهاييهاي مشترك انسانهاي امروزي.&lt;BR&gt;شعر سوم هم لطافت خودش رو با تلخي خاص يك پديده ي اجتماعي ِ مستمر به همراه اشت و پايانش رو بيشتر&lt;BR&gt;از شروعش مي پسندم . شعر چهارم هم تقريبا از همون موضوعيت اجتماعي اعتياد به تصويري آشنا كشيده شده كه جالب بود برام . كلا خوب بود خانم جمشيد&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt; &lt;STRONG&gt;احسان مهدیان&lt;/STRONG&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;( تندیس بومی وجودم ..)&lt;BR&gt;چقدر کلی و چقدر بی زمان و مکان است این گزاره !!&lt;BR&gt;(در دور دست چشم مرطوبم )&lt;BR&gt;نمی دانم خانم جمشید باید چه بگویم که شایسته باشد و هم شما را از من نرنجاند و هم واقعیتی لازم را بیان کرده باشم &lt;BR&gt;اما برادرانه و به عنوان یک خواننده می خواهم این متن را قرائت کنم اما تصاویری که صرفا انتزاعی و بدون کارگرد زبانی اند مرا به کنش وا نمی دارند &lt;BR&gt;اما وقتی می آیم در جای دیگر :&lt;BR&gt;(برام چای می ریزی و من ناخن می جوم )&lt;BR&gt;جریان عصبیت شعر را لمس می کنم میتوانم ساعت ها به آن فکر کنم و بنویسم اینجا چقدر شعر جریان دارد و بستر ناراحت و اعتراضی شعر دارد مرا در خود می برد و.... ببخشید اما نمی توانم بگویم چنس مجرد به عنوان فاحشه وجود دارد که می شود در شعر کاری انجام دهد و نه ! احتمالا نمی تواند &lt;BR&gt;شاید در اشعاری و در دهه 60 که در پشت ادبیات جنگ ، کار شعر می کردند این گونه روایت ها تا حدودی جان داشت اما نمی توانم در لایه های این شعر و این نگاه زیبایی شناختی جدیدی ببینم تقریبا آنچه بدان پرداخته شد آشنا هستند ! حتی در گفتار صالحی که شاید یک یادگاری از دهه 60 است دیگر این رفتار دیده نمی شوند .&lt;BR&gt;می بینید که خواندم و می بینید که می خواهم خوانش کنم اما متاسفم که ضعیف هستم و نمی توانم مرا ببخشید &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;STRONG&gt;م . نهانی&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;1-خطوط روی سنگ های غار که اصالتی فراموش نشدنی ست...فراخواندنی به سوی خلوت تنهایی که در پی اش کشف عاشقانه ای باشد...و حضوری که بیداری می زاید...&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;2-خیس باران نگاه در افقی دور ، آنسوی درختی قدکشیده تا آسمان...دور میز در تنهایی صدای خود و دیگری نجوایی را با خوردن چای تقسیم می کنیم...سوگوار نبودن اند این ثانیه ها...&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;3-اهل کوچه و خیابان و گفتارهای این شب تاریک...شهر با دست هایی زاده می شود...و در حاشیه اش دستی می میرد...و او فروخت گلی را نه به خاطر گلستانی...&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;4-در تعلیق ، همه جا آسمانش بود...بی بال بود اما پر از پرواز در سقوط نگاه دیگران خود را در اوج می پنداشت...و مرگ این گونه تفسیر می شود و سببی در کار نیست برای کشف رازی...&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;STRONG&gt;پرستو ارسطو&lt;/STRONG&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;/SPAN&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;1/&lt;BR&gt;رد پای رگه ی آشکار &quot;اروتيسم&quot;در شعر اول تغزل عاشقانه ی را تصویر کرده&lt;BR&gt;ولی اروتیک جریان اصلی شعر نیست بلکه اشتیاقی روحی و ذهنی حوایی ی شاعر به بازگشت به مبدا وجود است در واقع رومانتیسمی سمبولیکی را در ذهن تداعی میکند. بکار گرفتن عنصر(شکار) در اینجا به تصویر صدمه میزند زیرا مستقیمن یک نوع سرخوردگی جنسی را القا میکند(روانشناختی فروید)و از فضای رومانتیکی شعر میکاهد&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;2/ آفرينشی‌ ملهم‌از حسی نوستالژیک که حاکی ‌ از وجود بغصی در قالب درونی شاعر است&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;3/&lt;BR&gt;و باز بغضی این شعر را را فرياد می زند پدیده ه ی نه چندان تازه ی اجتماعی که ذهن شاعر را درگير این درد وزخم کهنه ی جامعه فقر و «بدن فروشی» کرده مضمون تازه ای نیست ولی حقیقتی دردناک که هر چه بیشتردر ذهن جامعه براین معضل فوکوس شود میتوان امیدوار شد که مرهمی هم پیدا شود &lt;BR&gt;این بند بسیار بهجانم نشست&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;صدای فقر با دامنش بالاست&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;4/اشاره ی تلخی به یکی از معضلات بزرگ و پيچيده جوامع انسانی شده و شراره ی جمشید با زبانی متفاوت این معضل ذيستی ، روانی و اجتماعی را مطرح کرده &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;چهار شعر دزدناک تا نمیه دردناک خواندم چیزی که از شراره ی عزیز کمتر خوانده بودم&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;/P&gt;&lt;/SPAN&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;STRONG&gt;مریم اسحاقی&lt;/STRONG&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;/SPAN&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;سلام &lt;BR&gt;ا. شعر اولتان را چند باره خواندم. تندیس بومی وجود و تنهایی ته غار، نیمه ی غایب و خفته که بوسه می خواهد. گویی شاعر درگیر حس نوستالژیکی شده که نیمه ی غایب تنش ( تنِ زن )از روزگار شکار و غار خفته است و منتظر، تنهایی که زمان نمی شناسد.&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;2. شعر دومتان حس صمیمی و خوبی داشت.&lt;BR&gt;3.این سطرها بسیار درخشان بود:&lt;BR&gt;« صدای فقر با دامنش بالاست.»&lt;BR&gt;« فاحشه ای جوان &lt;BR&gt;غنچه ها را دل تنگ بود.» و ارتباط این سطر با سطر اول که دیگر گل نمی فروشند، گویی شاعر می خواهد واقعیتی را نشان دهد که در متن جامعه جاری ست. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;شعرهاتان مثل همیشه زیبا و ژرف سروده شده و اندیشه ای پس و پشتشان نشسته که دوست داشتنی ست.&lt;BR&gt;&lt;/P&gt;&lt;/SPAN&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;/SPAN&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;STRONG&gt;محمد علی حسنلو&lt;/STRONG&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;سلام خانم جمشید . &lt;BR&gt;با اجازه نظرم را در مورد هر چهار شعر می نویسم . &lt;BR&gt;شعر اول با یک حرف کلی شروع شده که واقعیت این است که من آنرا شروع خوبی نمی دانم .اتفاقاتی که در این شعر برایم می افتد تازه گی ندارد و به همنی دلیل هیچ اتفاقی در من ایجاد نمی کند .&lt;BR&gt;در شعر دوم من شاعری را می بینم که آرام آرام شاعرانه حرف می زند . &lt;BR&gt;نقص شعر قبل در شروع این شعر نیز هست .&lt;BR&gt;یک ترکیب وصفی (چشم مرطوبم )از همان ابتدا نفس شعر را می گیرد و به شاعر کمتر اجازه تصویر سازی را می دهد . البته این مشل در سایر سطرها برطرف شده .&lt;BR&gt;شعر سوم خارج از اینکه شعارگونه شود واقعاً شعر بود برایم . به خصوص سطر سوم آن که شاعر به خوبی تمام چیزی که در ذهنش بود را به بهترین شکل بیان کرده بود.&lt;BR&gt;صدای فقر ، با دامنش بالاست .&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;شعر چهارم هم به دلنشین بود و تکان دهنده . به خصوص سطر پایانی این شعر . &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;یک پک تا سقوط &lt;BR&gt;پلکش را خوایاند . &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;در کل شعرهای اجتماعی شما همه اندیشه ای عمیق داشتند که شاعر به خصوص در شعر سوم و چهارم به خوبی از عهده ی همه چیز برآمده بود .&lt;BR&gt;&lt;/P&gt;&lt;/SPAN&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/SPAN&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;STRONG&gt;سیتکا&lt;/STRONG&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;1&lt;BR&gt;واژه های شعرتان سرشار تنهایی اند . می توان دیواره های شعرتان را با استحکام این سروده لمس کرد &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;2&lt;BR&gt;برودت تنهایی و سوگواری حروف شانه های خواندنم را فشرد&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;3&lt;BR&gt;غنچه های دلتنگ دست های پر از فحشا امروز فقر می فروشد&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;4&lt;BR&gt;حیال شعرتان ستودنی است&lt;BR&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/SPAN&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;STRONG&gt;استاد جلیل قیصری&lt;/STRONG&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;سلام...&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;در شعر اول غار گذشته از اين كه معناي تنهايي و تمايل راوي به شكار شدن را در خود دارد در سويه ي اسطوره اي اش نمادي از رحم مادر و محل ارامش و تطهير است و هم پختگي معنوي و رسيدن :كه اي صوفي شراب انگه شود صاف....-واژه ي -بومي هم بوميت به معناي عام را در خود دارد و هم بومي غار بودن را ...تنهايي و غار و سكوت انگار راوي را به تنديسي شبيه كرده است اما نيمه ي بيدارش كه همان تمايل انساني -اسطوره اي - است به نيمه ي خفته ي خود آگاه هست و ارزوي لمس ديواره هاي وجود و شكار شدن را دارد با بوسه اي كه مقدمه ي اميزش و امتزاج است و زيباترين مقدمه ها -بومي تنهايبي -تنديس -شكا ر- غار وحدت مضموني خوبي به شعر بخشيده است ضمن اين كه ميل به شكار شدن به نگري يك تمايل سرشتي است بيشتر... و تمايل جنسي مي تواند يكي از سويه هاي اين شعر باشد در تأويل&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;شعر دوم يك پارادوكس زماني -مكاني را تداعي مي كند -دورِ نزديك يا نزديكِ دور -اما پايانه ي دو پهلوي شعر زيباست ميل به شانه ها راوي را سوگوار مي كند ايا كسي كه چاي مي ريزد از دست رفته اي است ؟...شعر سوم شاعرانگي خوبي دارد موضوع اگرچه قدري اشناست اما تلفيق تازه اي صورت گرفته و خلاقيتي در يك تركيب جديد .شعر چهارم موجز و مقتصد است مصرع اول را مي شود تعديل كرد و مثلن با حذف -ابري - شروع كار را روان تر كرد و از تتابع اضافات كاست اما اين شعر هم در ايجاز كيفي خوبي نشسته است .&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;/SPAN&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT size=3&gt;احمد موسوی&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;خانم جمشید بابت تاخیر پوزش. کارهایتان را خواندم. ببینید میان پژوهش کلی در باب ماهیت خوبی و ارزیابی آثار هنری ممکن است شکاف عمیقی به نظر آید. غالبن با اخلاقیات به ویژه در زمان های متاخر به عنوان یکی از موضوعات جانبی نقد که کار منتقد را باید به دقت از آن جدا کرد معامله می شود. همواره تقسیم تجارب به خوب و بد و ارزش مند و خلاف آن را بسیار اسان تر از کشف آن چه در هنگام تقسیم بندی می کینم یافته اند. قطعه اول شما زیاد معطل نمی کند. موجه نمایی این شعر اساسن یک تصور متافیزیکی هست که صفاتی به مفهوم جوهر های ثابت وجود دارند که به خصوصیات موجود ملحق می شوند. اما این فرض هم جایز است که به هیچ چیز تعلق ندارند. این جوهر های متافیزیکی را که به نام های گوناگونی مانند مثل تصورات مفاهیم کلی یا مفاهیم عامه خوانده می شوند را می توان به دو نوع حسی و فوق حسی تقسیم کرد. حسی آن هایی هستند که به کمک حواس دریافت می شوند مانند لمس دیواره ها بوسه. جوهر های فوق حسی هم آن هایی هستند که نه به طریق محسوس بلکه به طورق دیگر درک می شوند. روابط منطقی ضرورت یا عدم امکان و چیز هایی از قبیل اراده هدف و علت که مستقیمن مدرک ذهن واقع می گردند. خوب را شاید بتوان در میان این مفاهیم فوق حسی یافت &lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=author&gt;اما کار دوم یک قطعه رمانتیک سرشار از ارزو و انتظار. فکر می کنم پیچیدگی های ممکن در نظام انگیزه ها را یم شد به گونه ای نا محدود نوشت. میزان انعطاف امیال و فعالیت های خاص بسیار متغیر هستند. برخی از انگیزه ها را آسان تر از بقیه می توان دگرگون کرد. به وطر ماثل انگیزه جنسی این جا به نظر من رشته دراز تری از ارضا نسبیت به نوشیدن آن چای دارد. برخی از بقسه ضعیف تر هستند. برخی از آن ها از قاعده همه یا هیچ پیروی می کنند. یعنی یا باید آن ها را به مفهوم کامل کلمه ارضا کرد یا به طور کامل ممنوع ساخت. در درون کل یک سازمان بعضن نظام یافته نظام های فرعی فراوانی را می توان یافت و آن چه انتظار می رفته که انگیزه هایی کاملن جزیی باشند غالبن معلوم می شوند که مهم هستند.زیرا به گروه هایی نیرومند تعلق دارند.&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=author&gt;و قطعه سوم چه قدر دوست داشتم بیشتر شاهد حرکت و جریان سیال ذهن می بودم و این گونه واژه ها و مفهوم را عریان نمی دیدم.کار چهارم هم بیشتر شاهد تصاویر دیداری هستم. رایج ترین چیزی که از تخیل اراده می شود و کمتر از همه جالب توجه هست و مفهوم هم محدود تر از آن هست در آن بازسازی هم دلانه از حالات ذهنی افراد دیگر به ویژه حالات عاطفی آن ها اراده می شود. البته نباید این نکته را هم فراموش کرد که قدرت ترکیبی و جادویی که خود را در تعادل یا سازش میان کیفیات متضاد یا ناسازگار نشان می دهد. &lt;BR&gt;ممنون و سبز بمانید&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;/SPAN&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;STRONG&gt;کلاغ راست مغز / نریمان&lt;/STRONG&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;سلام شراره عزیز &lt;BR&gt;و پوزش برای تاخیر &lt;BR&gt;شعر اول &lt;BR&gt;ابتدا جنبه اروتیکی به نظرم آمد &lt;BR&gt;ابتدا! &lt;BR&gt;بمانند شعرهای فروغ &lt;BR&gt;ولی مردد شدم &lt;BR&gt;و ابهامی شروع شد &lt;BR&gt;خط اول ضمیر اوست &lt;BR&gt;و خطوط بعدی شاعر &lt;BR&gt;پس چگونه مرتیط هستند ؟&lt;BR&gt;او همان احتمالا شاعر است &lt;BR&gt;و نیاز به مهربانی دارد و از خود شاعر نمی خواهد رد پایی بگذرد &lt;BR&gt;و در خطوط بعدی به کمک آن یکی شاعر می آید &lt;BR&gt;من بیشتر غمگینی را حس کردم &lt;BR&gt;تا اروتیسم را &lt;BR&gt;شاید نوعی عصیان حتی در برابر نفهمیدن آن (او) و تنهاییش - توسط دیگران &lt;BR&gt;میل بداشتن چیزی یا کسی که زهدان برای آن تمثیلی است زیباست &lt;BR&gt;محبت و انتقال دوست داشتن &lt;BR&gt;شعر دوم :&lt;BR&gt;گفته بودی چای دوست داری و فلوت را زندگی مگر دیگر چیست ؟یادت هست ؟&lt;BR&gt;باز هم تنهایی و دوست داشتن آن که ترا تنها گذاشته &lt;BR&gt;یک عزیز &lt;BR&gt;که شاید دیگر هم نباشد &lt;BR&gt;و فاصله هاست که نمی گذارد مهربانی او حتی با تعارف یک چای بتو برسد &lt;BR&gt;فاصله هایی به اندازه شمشادها که در عین حال نرم بودن و عدم خشونتو ظاهری آراسته - محکم و پابرجا هستند و فاصله گذار &lt;BR&gt;باز هم خشونت همراه با غمگینی که بیشتر استیصال بی چاره بودن است &lt;BR&gt;شعر سوم :&lt;BR&gt;تغییری که ظاهرا برای بهبود کار می بایستی انجام میشد ولیکن باز هم &lt;BR&gt;کارها خراب است و دلتنگیها هنوز هم پا برجاست &lt;BR&gt;گاهی در فاصله غمگینی و عصبیت تغیراتی ظاهرا مناسب ایجاد میشود &lt;BR&gt;ولی ظاهرا &lt;BR&gt;زیرا دیوارها هنوز باقیست و هنوز هم انتظار خسته می کند راوی را &lt;BR&gt;شعر چهارم :&lt;BR&gt;از شعر یک و دو از غمگینی و عصبانیت به شعر سوم و تصمیم گیری &lt;BR&gt;و سراب بودن افکار &lt;BR&gt;و پوچی &lt;BR&gt;و کم نشدن فاصله ها &lt;BR&gt;و رها کردن خویش در فلسفه گور بابای همه چیز &lt;BR&gt;و رها کردن و باور داشتن شکست نمی دانم کیست و شاید که بوده ولی خیالش نیز ترا بچالش می کشد هر چه هست دلت برایش خیلی تنگ میشود حتی اگر اگرمن وجودیت باشد .&lt;BR&gt;شعر منسجم و زیبایی بوود به نظرم میرسد که اشتراک شعر اول و دوم در معنی و بار مفهومی نسبت به 3 و 4 نوعی سلب مسوولیت کردن است از آنچه که در شعرهای سوم و چهارم اتفاق می افتد &lt;BR&gt;راوی می خواهد خواننده با هم ذات پنداری همراه با دادن حق به راوی بخشی از اعمال خویش را تطهیر کند که بنظر میرسد واقعا نیز حق با راوی است .در این مدت که افتخار خوندن شعرهایت را دارم از نوع و سیاق کلمات و خط روایی آین شعر خیلی خوشم آمد .&lt;BR&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;/SPAN&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;STRONG&gt;سميه طوسي&lt;/STRONG&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;آثار ارزشمندتان را خواندم .در اثر اول حس مي كنم توصيف وفضايي كه از عصاره ي وجودي من شعر مي شود ؛ احتياج به كشف شدن دارد نه شكار كردن .تنديس ِ بكري كه هنوز ته غار تنهايي خودش است .حس مي كنم كشف كردن لطيف تر با سطرهاي بعد ارتباط پيدا مي كند .لمس ديواره هاي وجودم را دوست داشتم . تركيب خوبي بود .ملموس!&lt;BR&gt;كار دوم بسيار قابل دسترسي و قابل لمس بود .اتفاقي بود كه حتي اگر براي مخاطب اتفاق هم نيفتاده مي توانست انرا درك كند و در فضاي ان قرار بگيرد .ناخن جويدن فضا را كاملا دخترانه مي كند.حيايي خاص در اين اثر ديدم.&lt;BR&gt;در اثر سوم نمي دانم « با » قبل از دامنش لازم است يا نه ؟ قدرت تاويل اش در هر دو صورت قابل تامل است .حس مي كنم بدون با بيشتر !&lt;BR&gt;در اثر چهارم كاش كسره هاي سطر اول را لحاظ نكرده بوديد .ان وقت دو تا خوانش پيدا مي كرد كه در قدرت اثر بسيار موثر بود .&lt;BR&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;STRONG&gt;حسن سهولی&lt;/STRONG&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;شعری بالایه هایی ازذهن درگیربامواردیکه حقیقت دارندوبه واقعیت رسیدنشان شایدجرمی روانی دارد نوعی اروتیسم ملیح که عرف رانمی اندیشد وشاید سهم طبیعی هر کسی باشدعلاوه برآن مسایل مبتلا به موارد اجتماعی وپیچیدگی های زندگی بشری ازنوع خودش درکل اشعار نمایان است.&lt;BR&gt;زبان شعر ساده وروایت گونه است&lt;BR&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/SPAN&gt; &lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;STRONG&gt;شینا&lt;/STRONG&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;درود خانم جمشید. و بیان ٍ سپاسی آمیخته به یک جور تحسین، برای به اشتراک گذاشتن احساسات ٍ این چنین زیبایتان، با زبان ٍ معطر شعر؛ قبل از هر سخن.&lt;IMG src=&quot;http://www.blogfa.com/cmt/images/20.gif&quot;&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;1. از آنگونه شعرهایی ست که پوست تنم را می کشد و زیر پیراهنم پیش می آید. شعری آکنده از شهوتی احترام آمیز...&lt;BR&gt;فقط اینکه به ضم من از ضمیر اول شخص مفرد به افراط استفاده شده است. &lt;BR&gt;&quot; تندیس ٍ بومی ِ وجودم&lt;BR&gt;ته ٍ غار تنهاست&lt;BR&gt;به شکارم بیا&lt;BR&gt;به لمس دیواره های وجود...&lt;BR&gt;نیمه ی خفته...&lt;BR&gt;بوسه می خواهد&quot;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;2. داستانی حقیقی که در جهتی وارونه نقل می شود؛ آرامشی پشت شمشادها و اضطرابی که پایان داستان را به گرفتاری می کشاند، آن هم نشسته بر صندلی حصیری توی ایوان...&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;3. از آن شعرهای اجتماعی موثر است که همیشه نظرم را به خود جلب می کند. احساسی که دست می دهد یک جور درد ٍ خفیف است که به لذتی ناخواسته نیز دچارم می کند. آدم زیر پوست این شعر می تواند کلی خیال ببافد و انتظار بکشد، اما چیزی در ان به حال منقبض باقی می ماند. چیزی شبیه ترس که توی دل دخترک موج برمی دارد.&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;4. برای حادثه ی این شعر&lt;BR&gt;من&lt;BR&gt;فقط&lt;BR&gt;یک شمع روشن می کنم...&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;/SPAN&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT size=3&gt;بانو مینو نصرت&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt; &lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;/SPAN&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;من از تقدس عدد چهار ، فصل هایش را می گیرم و بسط می دهم به این شعر!&lt;BR&gt;تندیس زن در غار نخستین/ شاید شاعر با آوردن شکار اصرار بر این دارد که مخاطب را برگرداند به زمان نخستین و اینکه شکار و شکارچی در وحدت بودند و یگانه / نخستین میل بقا . و عشق در این شعر زیبای خفته ای را تداعی مکند که با شکار بوسه ای بیدار می شود و نیمه ی همیشه خفته ی شاعر که امروز آن را بشدت احساس میکند ، هنوز در همان غار است و منتظر بوسه ای که امروز شوالیه اش را گم کرده است و شکارچیانش دهانی برای بوسه ندارند .&lt;BR&gt;فصل دوم همان نیمه ی خفته است که در ایوان خود نشسته و از دو ر ها به شانه هایی خیره است که تمنایش را از دیر باز در خود داشته ، شانه هائی که پشت شمشاد ها را دوست تر دارد ، میل بزهکاری ست شاید که دارد چای میریزد و شاعر معشوقی حقیقی ست و خیال بافی دوست ندارد .&lt;BR&gt;فصل سوم ادامه ی دو فصل دیگر است و قحطی چنان ضخیم شده است که دیگر دخترک گل نمی فروشد و فقر دامنش را در جهان مدرن امروز مثل همیشه بالا می زند . گل با چیز دیگر تعویض شده است . دیگر کسی بوی گل نمی خواهد و به بوی آن عاشق نمیشود . کارجهان با یک فعل راه می افتد و اینجاست که بناگاه آهی از درد از حنجره ی شاعر بیرون می خیزد و خود را بیشتر دوست دارد بچسباند به آن نیمه ی در غار مانده اش .&lt;BR&gt;فصل چهارم همیشه زمستان است و سقوط از ارتفاع به قعر دانه ها و حراراتی که زهدان خاک را بارور میکند . برای کسی که بال ندارد ، پرواز تعمدی برای سقوط قطعی است .&lt;BR&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt; &lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt;حسین صولتی&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;با درود .. بانو جمشید ... شعر هایتان را خواندم .. بارها ... البته مثل همیشه از اخر به اول ..... &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;و البته بعد از ان کامنت دانی را ... نگاهها را خواندم که هر کدام از ما خود را در شعر می یابیم و به قولی تعمیم میدهیم .. ... &lt;BR&gt;واین رتبه و درک مطالب و مفاهیم شعر را اسانتر و جالبتر می نماید ... تصویر سازی برای درک یک حکم ارایه شده در پروسه ایی از یک نماد ..... از یک فکر .. از حرکتی انتزاعی و زیگزاک در گیر ودار سخن ...... &lt;BR&gt;به نظر من درک فحوای کلام و معنادر انتها در اختیار شاعر است وو اوست که میداند در چه موضعی از قراری که داشته .. شعر را متولد شده .. و این حسادت و حسرتی ست که همیشه در من باقی می ماند .. از تصاحب واقعیت یک شعر .. یک دلتنگی ....یک ارزو .... &lt;BR&gt;نگاههای شما را همیشه دوست دارم ..... گرچه رازی که میان شما و کلماتی که ساخته و پرداخته اید را هیچگاه در ک نخواهم کرد .... اما لمس نوعی دیگر از انسان ..... نظری هر چند گذرا.. و نگاه کردن در چشمان اسمانی که شاعری در ان ذهن را پرواز داده لذتی خاص را تداعی می کند .. که همواره به این امید شعر را ملوس و خواندنی می نماید ... &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;بيا به شــــــكــار ِ من&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;به لمــس ِ ديــواره هــاي وجــودم&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;.........................................&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;معلق در حجــم ِ ابري ِ خاكـــــــــستري&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;خیال پریدن&lt;BR&gt;پروازش مي داد&lt;BR&gt;يـــــــك پلک تا سقوط&lt;BR&gt;پکی دیگر خواست ولی قورتش داد&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;/SPAN&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT size=3&gt;حميد ربيعي&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;درود خانم &quot;جمشيد &quot;گرامي&lt;BR&gt;شعرهاي كوتاهتان را خواندم و حقيقتن لذت بردم.&lt;BR&gt;شعر نخستين با روايتي &quot;تراژيك &quot;گونه كه البته آميخته بود با نگاهي اسطوره اي طراوت و زيبايي خاصي داشت.حضور غار اين اولين ماوا و ملجاء انسان و قرار گرفتنش در اين شعر بعد و عمق لازم را به شعر بخشيده بود.شاعر درادامه اما با نگاهي ديگر از معشوق مي خواهد كه با تمام وجود او را درك كند .او را لمس كند همان نيمه ي ديگري كه منتظر بوسه اي، ديرگاهي است كه چشم براه مانده است. &lt;BR&gt;اين قسمت شعر مرا به ياد فلسفه ي وحدت وجودي انداخت و اينكه زن و مرد اين دو گونه ي دستگاه آفرينش در حقيقت دو نيمه ي يك پازل اند و اين معنا تنها در عينيت يافتن وحدت به ثمر مي نشيند .&lt;BR&gt;شعر دوم اما حال و هوايي ديگر داشت. شعر روي بالهاي يك &quot;رومانتيسيسم &quot;خاص پرباز كرده بود و مرا به ياد رومانتيك نويس هاي آلماني انداخت. چرا كه نمادهاي طبيعي و ديدگاهي &quot;ناتوراليسمي &quot;نيز در پشت واژگان اين شعر پنهان بود.كار قوي و جانداري بود.استفاده از اصطلاح ناخن جويدن نيز آن بار ياس و اضطراب را به شعر تزريق كرده بود .&lt;BR&gt;كار سوم با رويكردي اجتماعي به شكافتن و آسيب شناسي معضلات جامعه ي بيمار امروز پرداخته بود .با نگاهي عميق به مسئله ي فقر و احتياج و فحشا در واقع رسالت كلمه را به انجام رسانيده بود.و صداي متروي آخر كه هنوز هم در مغزم سوت مي كشد. يكي از وظايف و رسالات شاعر اين است كه زبان حال جامعه باشد و شما با سرايش اين شعر وظيفه تان را به نحوي مطلوب انجام داده ايد.زيبا بود.زيبا ولي غمگين ...&lt;BR&gt;فضاي شعر چهارم اميخته با ترس غريبي بود.شعري كه بوي هيجان و اظطراب مي داد.با تصاويري زنده كه همچون صحنه هاي فيلم از مقابل ديدگان مخاطب رژه مي رفتند.كار خوبي بود.&lt;BR&gt;در كل توانسته بوديد بدون اينكه ذهن مخاطبتان را خسته كنيد.با سرايش چهار شعر متفاوت از لحاظ ايماژ و فضا و فحوا هم مطلب خودتان را با زبان شعر بيان كرده باشيد و هم اينكه اين شانس را به خواننده داده بوديد تا در فضاهايي متفاوت نفس بكشد. و اين يعني موفقيت شاعر در سرايش شعر.&lt;BR&gt;وبلاگي وزين و خوبي داريد .با ان نقاشي زيبا از&quot;كاندينسكي&quot; و جملات نغزي كه از نرودا و ديگران نوشته ايد.&lt;BR&gt;سپاس از حضور سبزتان&lt;BR&gt;به اميد ديدارهاي آينده ...&lt;BR&gt;&quot;سبز مانيد شاعر&quot;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT size=3&gt;علی فتحی مقدم&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;شعرهایی از جنس تفکر و درون مایه ای از جنس تغزلی حسی خواندم .این روزها کم نیست فریاد زدن خلاءای فربه که از روح بشر آغاز و تهدیدی جدی در آینده ی زمینیان. شاعر از لحظه هایی می گوید که ترس از فاش شدن را در خود کشته و هرآنچه از او خواندم صداقتی شگرف در ساق مرمر کلاماتی شاعرانه است .او فضایی غریب را در ذهن مخاطب ترسیم می کند وقتی که می گوید:&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;بيا به شــــــكــار ِ من&lt;BR&gt;به لمــس ِ ديــواره هــاي وجــودم&lt;BR&gt;نيــمــه ي خــُــفته ام&lt;BR&gt;بــوسه مــي خواهد . . . &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;یا در گوشه ای دیگر ازدنیای خود ساخته ی ذهنش چنان اظطراب وصال را به شوقی عصبی پیوند زده که گویی عشق ورزی خلاءای در (اوی) معاصراش مفهومی تراژدیک پیدا کرده است وقتی که می گوید:&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;در دور دست ِ چـــشـــــــم ِ مرطــوبم&lt;BR&gt;پشت شمشـــادهــا&lt;BR&gt;برايــــم چاي مــي ريــزي &lt;BR&gt;من در ايـــوان&lt;BR&gt;ناخــُــن مي جــَوَم&lt;BR&gt;ميل به شــانه هات&lt;BR&gt;سوگوارم مي كند .&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;اما در شعر سه شاعر با کلمات چه کرده که اینچنین تراژدی اشکباری را در چشمان مخاطب و کلمه به راه انداخته .او از دردی نوشت که من به چشم خود دیده ام و گریسته ام تجربه ی عینی را به نمایش گذاشته که من در پیرامون بعضا کثیف زمین شاهد بودم .او از فقری کثیف می گوید که گلهای نجیب و معصوم دامن که هیچ ،بلکه انسانیت برامده از خلوت یک زن را تهدید به نابودی کرده وقتی که می گوید:&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;ديــگر گـــُل نمي فروشد&lt;BR&gt;گــــوش بچسبان بـــه ديـــوار&lt;BR&gt;صداي فقر ، با دامنش بالاست .&lt;BR&gt;آخرين متروي شب كه رفت&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;BR&gt;فاحشه اي جوان&lt;BR&gt;غنچه ها را دلتنگ بود .&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;شراره جان ! با شعر سوم گریستم و سوختم . باورکن دیگر زبانم بند آمد پس تا بعد بدرود شاعر .&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT size=3&gt;سامان سپنتا&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;FONT size=2&gt;انسانی که در پس این شعر ها نشسته بسیار لایه مند تر از خود آن هاست . گاه زبان ، کم می آورد در بیان حرف هایی که برای نگفتن داری خانم جمشید!&lt;BR&gt;..&lt;BR&gt;..&lt;BR&gt;..&lt;BR&gt;راستی چرا پاره ای از ما می کوشیم انتزاع را از مدار کارکردهای زبانی شعر خارج کنیم؟&lt;BR&gt;من که شخصن از وجود انتزاع در کارهای شاعران به ویژه شما استقبال می کنم اما در همان حال از در افتادن به ورطه ی انتزاع صرف هم بیم می دهم&lt;/FONT&gt;.&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;STRONG&gt;رقیه کبیری&lt;/STRONG&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;FONT size=2&gt;زن تندیسی است درغار تنهایی اش برای تمام سال هایش حتی زمانی که سرشار از عشق باشد .تنها زمانی این تندیس پرستیدنی است که کامیاب کند و با تمام وجودش از خود بودنش بگذرد .این حس بسیار تلخی است برای یک انسان .دوست دارم غار تنهایی ام تنها برای لحظه ای هم شده برای خودم باشد تا پژواک صدای خودم را سنگینی وجودم را در فضای آن احساس کنم .و خود را بیابم .&lt;BR&gt;&quot;در دوردست چشم مرطوب &quot; اضطراب تنهایی و ترس ازدست دادن را دراین شعر کاملا&quot;حس کردم .&lt;BR&gt;چشم تمام شهر در پشت دیوارها مدفون./دردی عظیم که لگد مال شود غنچه ای قبل از شکفتن .&lt;BR&gt;از خواندن شعرهایتان لذت برددم .دلتگی غریبی تمام وجودم را فرا گرفت .&lt;BR&gt;با درود .&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT size=3&gt;علی جهانگیری&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;FONT size=2&gt;با درود و سپاس &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;اجازه بدهید در این نوبت تنها به شعر اول بپردازم &lt;BR&gt;ارتباط ساختاری عمیق بین اجزا و تعریف ارگانیک این اجزا چنان طبیعی اتفاق افتاده است که ما را به جای هوشمندی انتخاب ، به تربیتی هوشمندانه می رساند . &lt;BR&gt;اینکه ابتدای این شعر ، مبتلا شده به ابتدا &lt;BR&gt;ابتدا با ظرافت دعوت را در خود پیچیده است و آن هم دعوت به ته « ته غار تنهاست » ته ، آخر ، غار ، تنهایی ، انگار از غار که میگوید ته ته همه را مهیا کرده است و این واژه ها چنان هوشیار انتخاب شده که سرایش را در ذهنم دوباره سروده است .دعوت ، میل آشکار شکار شدن است ، اینگونه که از ابتدا به بسط دعوت رسیده ایم و اینکه ابتدا مبتلا شده است به انتها&lt;BR&gt;ارتباط بین ته ، تنهایی وغار** غار و تندیس و دیواره ** لمس و بوسه همه موید همین حضور ارگانیک عناصر معنایی جهت دار برای اشاره به متنیت متن را دارد . &lt;BR&gt;در عین حال این تکرار « وجودم » نتوانسته در من علت وجودی این تکرار را باز یابد :&lt;BR&gt;« تندیس بومی وجودم »&lt;BR&gt;« دیواره های وجودم » &lt;BR&gt;شاید لازم باشد چندین باره بخوانم و بخوانم ، یقین در ناسازی من است &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;اگر فمینیسم را بخواهم در تنها سه محور اروتیک ، چالش و لحن زنانه بررسی نمائیم در این کار چنان سرشار به این مولفه ها پرداخته شده که میتوان این شعر را به عنوان یک نمونه خوب در این زمینه مثال زد . اگر فقط از لحاظ اروتیک بخواهیم به این کار بپردازیم باید گفت در این شعر بیش از آنکه به تن و تنانگی اندیشیده شود به برون شد رفتاری این قضیه با دغدغه بیشتری پرداخته است در این منظربه شمایل های پورنو تن نمی دهد و پیش از اندیشیدن به جنس ، به جغرافیای حضور می اندیشد . &lt;BR&gt;اگر میل چیدن را در دست باغبان می بینیم ، بی انصافی است که میل زیبای چیده شدن را در میوه ی رسیده نبینیم . &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;شرم نمیکنم ازینکه بگویم این شعر چنان قابل لمس بود که میل بوسیدن و شکار را در من بیدار کرد .&lt;BR&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;FONT size=2&gt;&lt;STRONG&gt;گلاره چگینی&lt;/STRONG&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;FONT size=2&gt;شعر های کوتاهتان را خواندم و واقعا لذت بردم&lt;BR&gt;شعر نخست به نظرم نوعی روایت است که البته با آوردن کلماتی چون غار علاوه بر میل تنهایی نوعی نماد اسطوره ای دارد .اما من با شروع آن موافق نیستم.خیلی کلی شروع شده است و این کلی گویی مرا در این شعر به جایی نرساند.اما تفاقات خوبی در این شعر افتاده است که نظیرش را کمتر دیده ام مثل همین بوسه و همان شکار که خیلی زیبا بیان شده اند/آدم را وسوسه می کنند ها!&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;شعر دوم را دوست داشتم/تصاویر حقیقی خوبی در آن جریان دارد که من را جذب می کند چون کم کم به فضایی شاعرانه می کشانید مخاطب را و این خیلی خوب است اما باز هم آغاز...&lt;BR&gt;تصاویر این شعر فوق العاده اند.&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;سومین شعر شما به نظرم اوج این کارها بود/یعنی واقعا شعری بود در خور قلم توانای شما./صدای فقر با دامنش بالاست/این عالیست.&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;و شعر چهارم : دروغ چرا زیاد با این شعر ارتباط برقرار نکردم اما پایان بندی فوق العاده ای داشت.&lt;/FONT&gt;&lt;BR&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;FONT size=2&gt; &lt;/P&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;</description>
<pubDate>Sun, 30 Aug 2009 12:38:18 GMT</pubDate>
<comments>http://commenting.blogfa.com/?blogid=shararehaye-divanegi&amp;postid=45</comments>
<dc:creator>shararehaye-divanegi</dc:creator>
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<item>
<title>4 شعر / شراره جمشید </title>
<link>http://shararehaye-divanegi.blogfa.com/post-43.aspx</link>
<description>&lt;P dir=rtl align=justify&gt;1&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;كـاش مـادرم   « لـــــــــــيـدومـــــــا »  بـــــود&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;گـــــاه   دو  دســـتـــــــم  &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;                         &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;                             خــــــــاك را پـــــــــس مي زد &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;              ديــــــــــگر دلـــــــــــم &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;تــــَــــنگ نمــــــــي مــُرد  .&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;«لیدوما»&lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;کاخي هخامنشی&lt;B&gt; كه  &lt;/B&gt;برای سومین بار طی چندين سال گذشته&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt; برای جلوگیری از تخریب و آسیب‌های احتمالی  پس از پژو هش به&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt; زیر خاک بازگشت ... &lt;B&gt;&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;2&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;بـــــاران كـــه مـــــــي بـــــــارد&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;چكـــمـــه ي ســـُـــرخ لـا ســـتيـــــكــــــي&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;جـــُـــفـــت مـــــــي آيــــــد&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;                             كـــــــــو دكـــــــي اَم&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;                                              گــــل مـــــــــــي رود .&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;3&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;انــــجيــــــــر پــــــــيـــــر كجــــا ســـت    ؟&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;كيـــسه ما ســـــت مادر بزرگ  آويــــز ِ شــــــاخـــــــه اش&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;ســـــــايه اش گــــــــهواره ي رويــــا&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;و&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;انــــــدوه مــــن&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;قــــــطـــــره اي كـــــــه مي رفــــــــت در آب ِ  خــــــــواب   .&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;4&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;آن  روزهــــا&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;  &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;كـــــودكي ام&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;ســــــــنگــــــــها را پـــَـــس مي زد&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;                                           به تـــــــماشـــــاي هـــــــزار پــاهـــــا ي  خـــُــفــــتـــــه&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;ايِِِِِِِِِــــــن شـــــبــــــها&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;زيـــــر بالــــــشــَــم&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;مــــــــار ها بيـــــــدارنــــد&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;تا خـــــــواب مرا  نــــــــيــــــــش زنـــــنـــد    ........&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt; &lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;B&gt;نويسنده : شــــــــــــــراره جــــــمــشـــيــد&lt;/B&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt; ديدگاه دوستان&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;جليل قيصري :&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;در شعر اول راوی مادرش را -لیدوما - می خواهد ،لیدوما با آن بار فرهنگی اش... همه ی عشق راوی فقط کاویدن حضور مادر است مادری که می داند نیست!اما همین کاویدن ها عشق کودکانه ی راوی را تسلی می دهد تا دلش تنگ نمیرد دلی که خور اسیر گور تنگ و تنهایی است ..&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;.شعر دوم با ایجاز و اقتصاد کلمه خوب نشسته است :باران -چکمه ی لاستیکی و کودکی که گل می رود نکته ی بسیار ظریفی ار نظر فرهنگی و باور های بومی -ملی در این شعر نهفته است و آن جفت امدن چکمه های لاستیکی است می دانیم که در باورهای فرهنگی -عرفانی ما در گذشته کفش کسانی جفت می امد که دارای کشف و کرامات و خلوص روح بودند و از این نگر برای جفت امدن کفش ها چه عاملی بهتر از روح معصومانه ی کودک چنانکه اشخاص و بزرگان عرفان و شعرو خلوص را در در زیبایی و خلوص روح به کوک مثال می کردند و می کنند ضمن این که واژه -گل - بدون اعراب -گِل وگُل را تداعی می کند کودکی که در -گل - می رود و کودکی که با چکمه های قزمز در باران چون گُل می رود&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt; شعر سوم حکایت از انجیر پیری دارد که در بیشتر حیاط های قدیمی هنوز می بالندو با خاطرات کودکانه ی ما پیوند خورده اند اما قطره های ماست که از کیسه ی اویز بر شاخه ی انجیر می چکد می تواند زاینده ی اندوه باشد که ان هم در اب خواب می رود یعنی حتی این اندوه هم شیرین است چرا که از انجیر پیر می چکد و از حیاط خاطره ها .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt; در شعر چهارم تقابل کودکی و بزرگ سالی وجود دارد و هم تقابل روز و شب ...بازیگوشی کودکانه ای که به هزار پای خفته سرگرم بود اما ان رویای قشنگ به بیدار خوابی شب انجامیده است و نیش زدن مار هایی که زاییده ی هولناک ترین کابوس اند مار هایی که خواب راوی را نیش می زنند چه گذشته است در فاصله ی بین آن کودکی و این بزرگ سالی ؟...&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt; .......................&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;مينو نصرت :&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;بیست و شش سطر میان کلمه ی &quot; کاش &quot; و &quot; زنند &quot;، سبز شده است&lt;BR&gt;مثل گهواره پارچه ای قدیمی که از یک شاخه به شاخه ی دیگر متصل بود تا زیر پلک های خوابیده دخترک را پر سازد از رویا . &lt;BR&gt;تا از آن باستان تا امروز مسیری سبز شود از جوانه هائی که دشت دشت مرور میکنند فصل ها را و دل از جوانه زدن بر نمی دارند . میان کلمه ی اول و اخر ، اینجا باران می بارد و شعله ی به بار نشسته ، دست از شرر بر نمیدارد و تن به خاموشی نمی دهد و میان مروه و صفایش مدام در حال رفت و بازگشت است . میان امروز و دیروز ها ، همیشه چیزی گم می شود ، شکسته می شود ، ربوده می شود و... هر ازگاهی به شاخه ای منتهی می گردد با گلی نادر . از همان گل سرخی که امیر کوچولو را بر می گرداند به سیاره اش . سیاره ی ما کجاست ؟؟؟!!&lt;BR&gt;این شعر ها شاهد ند و بی قرار&lt;BR&gt;این کلمه ها تازه از دهان خاک بیرون ریخته اند و شوق بالندگی شان چنان است که این بیست و شش سطر این خانه را با بیست و شش رنگ زیبا ، بدل به جهانی تازه کنند . باوری که هر کلمه ی این شعر ها بر پشت خود حمل میکند و آه می کشد ، اما رویائی دارد سخت تماشائی .&lt;BR&gt;با تصاویری آشنا چشم انداز هائی ناب را طراحی کرده اید .&lt;BR&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;......................&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;احمد موسوي:&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;ادراک تصویر احساس و عاطفه همراه با لذت یا عدم لذت نام هایی برای ویژگی های خودآگاه انگیزه ها هست. این که چگونه می توان آن ها را به بهترین وجه دسته بندی کرد مسئله است که نارسایی های زبان در این خصوص آن را بسیار تشدید می کند. این جا به نظر نمی رسد لذات به خودی خود واقع شده باشند. چنین می نماید که لذت برای متن و شاعر بیشتر عبارت از نحوه وقوع چیزی هست تا واقعه مستقلی که خود بتواند به خودی خود در ذهن روی دهد. آن چه که این جا می بینم نه خود لذات بلکه تجاربی از این نوع یا آن نوع اعم از دیداری شنیداری ارگانیک و ... است که به همین سان هم ما نوعی از تجارب را هم داریم که نا مطبوع اند. زیر بالشم/ مارها بیدارند/ تا خواب مرا نیش زنند. شاید بخواهیم آن را آلام بنامیم که موجب بروز ابهام هم می شویم. استعمال لفظ لذت به صورتی که گویی هم چون یک درد به خودی خود تجربه ای کامل است. اما سخن گفتن از لذت یا عدم لذت ذاتی ادراکی شاید گمراه کننده باشد. خوشایندی یک ادراک برای من مخاطب می دانیم که متغیر است. این خوشایندی می تواند تغییر کند اما ویژگی های ادراک من هم چنان باقی ست.&lt;BR&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;........................&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;م.نهانی  :&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;-آروزیی همسان با قدمتی طولانی و با وقار وجود دارد که در پس آن ارزشمندی خاصی برای نگارگر این سطرها هست.&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;2-وقت و هنگام باران که ریزش قطره هایش را اجباری نیست یا که مصلحتی،خاطره یی با دو پای کوچک در چکمه یی رنگی از آن سوی خیس شدن ها می آید و ناپدید می شود.&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;3-گمان پیری است در درخت انجیر که مکانی برایش نیست یا که پیدا نیست.توشه های انسان است بر برگ هایش که سنگینی همه ی زندگی را دارد.سایه اش امن گاهی ست برای پرودن رویاهای بی زوال.و اندوهی را می شناسیم که از جنس آب فرو رفته در خواب.&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;4-در کشفی کودکانه اما اصیل هر جنبنده یی با تمام اجزایش حقیقت را راهبر بود.اما از آسودگی آن جستجوها ملالی فرو می ماند در روزهایی که&quot;بزرگی اش&quot;می نامند و خواب آرامی آرام نیست بر چشم ها دیگر...&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;................&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;پرستو ارسطو :&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;/SPAN&gt;چهار شعر موجز ولی پر بار به لحاظ غنای ریشه های باور ها وسنتها مرا به پرواز میخواندخط روشن وجریانی سیال از موج موح عاطفه وعشق هر چهار شعر را مثل رنگین کمان به همدیگر دوخته و بسیار شاعرانه به نکاتی دلانگیر و محرک ذهن اشاره شده.&lt;BR&gt;معصومیتی نجیب یا نجابتی معصوم در دامن کلمه ها به بکارت زبان واحساس شعر میبالدو همه چیر از ورایب لور نازک اندوهی کمرنگ زیباتر از واقعیت به نظر میاید ساختار هر چهار شعر در کمال سادگی بسیار بدیع وتازه است بی آنکه از واژه های و ترکیبات شگرف استفاده شده باشد&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;...........&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;محمد علی حسنلو :&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;SPAN class=author&gt;&lt;/SPAN&gt;1 - در شعر اول به خوبی فضاسازی لازم انجام شده تا شاعر منظورش را برساند . &lt;BR&gt;البته من همیشه فکر میکنم که بهتر است فضاسازی انقدر قوی باشد که نیازی به آوردن کلماتی که قرار است نوعی دلتنگی وحسرت را برساند ( منظورم کلمه ی کاش است ) و شعر را به صراحت لهجه دچار کند نباشد. در مجموع و در ادامه این کار خوب بود .&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;2- شعر دوم یک تکه از یک خاطره است که جرقه ای میزند و میرود .در مورد این شعر من چندان به واژه گل بدون اعراب توجه نکرده بودم . برداشت آقای قیصری برایم جالب بود .&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;3-در شعر دوم هم گویا دوباره خاطره ای در ذهن شاعر عزیز مرور میشود .من این شعر را نسبت به شعر اول از لحاظ فضاسازی موفقتر میدانم . در این شعر هم قرار است نوعی حسرت و با اندوه نگاه کردن به گذشته بیان شود ولی واژه ها کمتر این موضوع را به شکل مستقیم بیان می کنند بلکه این شاعر است که فضای این اتفاق را نشان میدهد و من این شعر را موفق میدانم .&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;4- این شعر هم انگار در همان وادی سه شعر نخست است . در این شعر هم فضاسازی و تصویر به چشم میخورد و شاعر با یک مقایسه کوچک نگرانی خودش را نشان میدهد . &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;دوست عزیز : در کل فکر میکنم درون گرایی در آثار اخیر شما بیشتر از قبل به چشم میخورد و این بازگشت امیدوارم سبب بوجود امدن شعرهایی زیبا و دلنشین شود همچون همین شعرها .&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;.................&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;
&lt;TABLE class=cmTable cellPadding=2 width=450 border=0&gt;
&lt;TBODY&gt;
&lt;TR&gt;
&lt;TD class=cmTdh colSpan=4&gt;سامان سپنتا :&lt;/TD&gt;&lt;/TR&gt;
&lt;TR&gt;
&lt;TD class=cmTdb width=&quot;100%&quot; colSpan=6&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;شعر نخست با تصویر سازی ساده اش ، شعری ست بی عیب و اثر گذار . شعر دوم و سوم چندان به دلم راست نیامد. شعر چهارم اما اگر از پاره ای واژگان آرکاییک موجود در آن بگذریم صفات نیک شعر نخست را دارد و کاری ست مقبول: ضرورتی در به کارگیری صورت های آرکاییک واژگان (خوابیده و بزنند ) دیده نمی شود .&lt;BR&gt;&lt;/TD&gt;&lt;/TR&gt;&lt;/TBODY&gt;&lt;/TABLE&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt; ..............&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;تراما . سعید نورالهی :&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;وشاید همه اینها همان آرزوی بازگشتن به کودکی است اما بازگشتی شاعرانه و همان کار اولتان بازگشتی است سخت تکان دهنده و سخت شاعرانه و چه قدر جالب است حتی اگر &quot;دیگر دلم..&quot; راهم نخوانیم ....بیش از این نمی توان از این اندیشه گفت /و می توان گفت که الهام ومکاشفه که در یک کار کوتاه ضروری تر از هر قالب دیگری است به قوت فریاد می کند و این که دست و قلم نقشی در این نوشتن نداشته اند.......................&lt;BR&gt;در کار دومتان گل رفتن را یا من نفهمیدم که شاید اصطلاحی بومی محلی باشد یا اینکه می توانست طور دیگری بیان شود ولی هیچ وقت نتوانست لذت کار اول را برایم تداعی کند...............&lt;BR&gt;کار سوم طرح ساده ای است و تصویری است زیر یک درخت که باعث به فراموشی سپردن غمهای شاعر کودک آشنا می شود و جز این توضیح چیز دیگری به ذهنم نمی رسد................&lt;BR&gt;کار چهارم را باید بگویم که پس لرزه ی کار اول است و یعنی این که دنبال تولدی گشتن /دوباره به رو آمدن /خاکها را کنار زدن...اما در آن ترسی شفاف تو را فرا خواهد گرفت ماری زیر بالش/ واین تفاوت تولد دوباره با تولد نخستین است..&lt;/P&gt;
&lt;P&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt;مراسم پاياني نخستين دوره‌ي جايزه‌ي شعر «نيما» با معرفي برگزيدگان برگزار شد. به ادامه&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt;مطلب بروید :&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Mon, 13 Jul 2009 15:36:18 GMT</pubDate>
<comments>http://commenting.blogfa.com/?blogid=shararehaye-divanegi&amp;postid=43</comments>
<dc:creator>shararehaye-divanegi</dc:creator>
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</item>
<item>
<title>شعری براي  نـــــــــــدا آقا سلطان / شراره جمشید </title>
<link>http://shararehaye-divanegi.blogfa.com/post-42.aspx</link>
<description>&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT color=#9933cc size=3&gt;براي  نـــــــــــدا و نگـــــــــاهــــــــش&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;FONT size=3&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt;دختــــــــركي مُـــــرد&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt;با چـــــشــــمــــــانــــــي باز&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt;و&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt;نگـــــاهـــــي كه خــــــــواب نمـــــــي خـــــواســـــت &lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt;نــــازُ ك  شــــــــانه هايـــــش&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt;جوانـــــــــي ِ مـــــــن بــــــود&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt;              كه اين جا مــــي لـــــــرزيد &lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt;و&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt;آواز حنجــــــــره اش&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt;همه ي فريادم&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt;گرچـــــــه در سكـــــــوت&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt;گر چــــــــه بــــي صــــدا&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt;سپــــــــيد چهره  ي زيــــــبايـــــــــت&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt;با دو گوشوار ِ خون&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt;همه اش تمنـــــاي بيداريســـــــــت&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt;آن كه تــــــــو را كُشــــــت&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt;در نامــــــــت اي نـــــــــدا&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt;تـــــــا ابـــــــد زندانيـــــــــست .....................&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;شراره جمشيد   ۲/۴/۸۸  &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;/STRONG&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P align=right&gt; &lt;FONT color=#66cc33 size=3&gt;&lt;STRONG&gt;خط سوم  با    &lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;A href=&quot;http://shararejamshid.blogfa.com/post-22.aspx&quot;&gt;&lt;FONT color=#66cc33 size=3&gt;&lt;STRONG&gt;2 نقاشی از برنت لینچ&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/A&gt;&lt;FONT color=#66cc33 size=3&gt;&lt;STRONG&gt;  به روز است .&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt; محمد حقوقی در دنباله&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Tue, 23 Jun 2009 10:26:18 GMT</pubDate>
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<dc:creator>shararehaye-divanegi</dc:creator>
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</item>
<item>
<title>یک شعر از کتاب &quot;کنسرت در جهنم&quot;  نوشته ی رسول یونان</title>
<link>http://shararehaye-divanegi.blogfa.com/post-41.aspx</link>
<description>&lt;P align=center&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt;و سرانجام&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt;از قصه های شکارچیان &lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt;چیزی نمی ماند&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt; جز یک مرغابی مرده &lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt;بر پیشخوان&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt;رنج آور است&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt;اما چیز مهمی نیست&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt;بگذار &lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt;هرچه دوست دارند&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt;تعریف کنند&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt;خوب یا بد &lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt;داستان ها باید ساخته شوند&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt;اما فراموش نکن&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt;تو باید &lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt;مثل انسان زندگی کنی&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt;جهان جای عجیبی ست&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt;اینجا&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt;هرکس شلیک می کند&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;FONT size=3&gt;&lt;STRONG&gt; خودش کشته می شود.&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=center&gt;&lt;IMG src=&quot;http://www.cabinsteel.com/images/products/product3.jpg&quot;&gt;&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Sun, 21 Jun 2009 18:16:18 GMT</pubDate>
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<dc:creator>shararehaye-divanegi</dc:creator>
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</item>
<item>
<title></title>
<link>http://shararehaye-divanegi.blogfa.com/post-44.aspx</link>
<description>&lt;DIV class=&quot;&quot;&gt; &lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=&quot;&quot; align=center&gt;&lt;IMG id=TB_Image height=438 alt=&apos;&lt;br/&gt;&lt;a href=&quot;http://i28.tinypic.com/2iaqwi8.jpg&quot; target=&quot;_blank&quot;&gt;View Raw Image&lt;/a&gt;&apos; src=&quot;http://i28.tinypic.com/2iaqwi8.jpg&quot; width=310&gt;&lt;/DIV&gt;</description>
<pubDate>Wed, 20 May 2009 21:04:18 GMT</pubDate>
<comments>http://commenting.blogfa.com/?blogid=shararehaye-divanegi&amp;postid=44</comments>
<dc:creator>shararehaye-divanegi</dc:creator>
<guid>http://shararehaye-divanegi.blogfa.com/post-44.aspx</guid>
</item>
<item>
<title>4 شعر کوتاه / شراره جمشید </title>
<link>http://shararehaye-divanegi.blogfa.com/post-39.aspx</link>
<description>&lt;STRONG&gt;  &lt;/STRONG&gt;
&lt;P&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt; ۱&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;« كبوتر »&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;از كــــــــبوتـــــر /&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;                                         صـــــُـلح  و ســــفــــــــيد  نديدم  ...&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;   ســــــردابــــي سيـــــاه  /&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;                                  يك دريچــــــــه ي ِ نگاه  /&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;                                         &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;                   رَگي سرگــــــــرم ســــــــرنگ   .&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;با كبــــــــوتر&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;تـــَرسَم ســــــــَـر مي رود  !!!&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;۲ &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;«  آخرين ديدار  »&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;آمـــــــدم تا بـــــــرف&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;زير كوهــــهـــاي يخ&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;                            آخرين ديدار    &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;                                             پــــــــدر ســــرد بـــود ...&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt; ۳&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;«  مـــــــــن »&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;تا تـــــــو راهــــــــي نيست  /&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;                                   «  مـــــــن  »&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;                                                        در جا مـــــي زند .&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt; ۴&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;«   كــــــَر »&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;هيــــــــچ براي شنيـــدن نيست /&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;                          جز صداي دو گوشوارَم  :&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;                             زوزه ي گرگ  / پارس ِ سگ .&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;                              خواب را كـــــــــــَر شده ام .&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt; نویسنده : شراره جمشید&lt;/STRONG&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P&gt; &lt;STRONG&gt;دیدگاه دوستان&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt; مینو نصرت&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;کبوتر هم واژه ای شبیه حوا است &lt;BR&gt;هر دو را به چیزی نسبت داده اند تا هرگز به او مربوط نبود &lt;BR&gt;هر دو را به یک چوب و با یک گناه می رانند &lt;BR&gt;حوا که مسبب هبوط آدم از بهشت شد&lt;BR&gt;کبوتر که نوید خشکی ها بود با شاخه ای زیتون بر منقار برای نوح پیامبر&lt;BR&gt;شعر آخرین دیدارتان تصویر نابی از بدن سرد پدر بود ، سرمائی که قادربه نفوذ است هنوز&lt;BR&gt;در شعر سوم / اگر تو را مقصد بدانی ، همیشه از غافلان قافله ای و جا میمانی &lt;BR&gt;شعر چهارم / نیاز به شنیدنی از نوع سوم دارد &lt;BR&gt;سلام و سپاس&lt;BR&gt;..............&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt;نادر امیر آبادی&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;BR&gt;شکل و شمایل زبان و لحن و نحوه ی بیان تان چیزی منحصر به خودتان و&lt;BR&gt;حالت های عاطفی و ویژگی های روانی و حتی جسمانی تان می شود &lt;BR&gt;.کبوتر که نگاهتان بدان /خاص خودتان است . چرا که کبوتر نمادی ست از &lt;BR&gt;صلح و مظلومیت ولی در این جا برای شما انگار فوبیایی ست که در ذهنتان لانه&lt;BR&gt;کرده . این را می گویم / چرا که در شعر پایانی نیز وحشت و ترسی از اصوات&lt;BR&gt;به همراه شعرتان است . ذات هر شعر با ذات نویسنده اش یکی ست .&lt;BR&gt;درونمایه های شعرتان شخصی و زیباست .&lt;BR&gt;و شعر3 اشارتی به علایق عرفانی و روحانی نویسنده دارد ...و پیامی بس عظیم&lt;BR&gt;در پس این شعر موجود است .&lt;BR&gt;شعر 2 درد است . سردی نماد عزیزان از دست رفته می باشد .&lt;BR&gt;............&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt;دکترروشن فومنی&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;احساسات ظریف شمادراین سپیددلانگیز جاری بود&lt;BR&gt;بارعمیقی ازاندیشه راحمل میکرد&lt;BR&gt;سخت تفکربرانگیز بود&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;مورداخری خیلی برایم دلچسب بود&lt;BR&gt;&quot;&quot;هیچ برای شنیدن نیست&lt;BR&gt;جزصدای دوگوشوارم &lt;BR&gt;زوزه گرگ&quot;&quot;&quot;&quot;&quot;&quot;پارس سگ&lt;BR&gt;خواب را کر شده ام&quot;&quot;&quot;&quot;&quot;&quot;&quot;&lt;BR&gt;.............&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt;م.نهانی&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;-گویی کبوتر و نمادی که با آن سر می دادیم آواز رهایی موجودیتش را از دست داده است.&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;2-یخ و برف...همسانی دگرگونی و تغییری که به حق نیست شاید.&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;3-آنقدر در خود مانده ایم و تا تو که چند قدم هم نمانده باز نمی رسیم...محاقی در خود داریم...&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;4-تعبیر &quot; خواب را كـــــــــــَر شده ام &quot; خیلی ظریف و زیباست&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;در کل چهار شعر در مضمون، عمیق و در ظرفت زبانی، زیبا خواندم.موفق و شاد باشید.&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;/P&gt;
&lt;DIV&gt;&lt;BR&gt;&lt;STRONG&gt;شراره جمشید :&lt;/STRONG&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;1-گویی کبوتر و نمادی که با آن سر می دادیم آواز رهایی موجودیتش را از دست داده است....&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;شراره جمشيد : آيا نمي شود جز اين تصوير از كبوتر ، تصوير ديگر و نگاه از ذاويه اي ديگر در &lt;BR&gt;خطوط شعر بنشيند ؟ ميدانم سنت شكني ست اين كبوتر بيچاره را اينگونه تفسير كردن ،&lt;BR&gt;ليكن چه كنم كه نه در تخيل كه در واقع اين « من » چنين مي بيند .&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;2-یخ و برف...همسانی دگرگونی و تغییری که به حق نیست شاید.&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;شراره جمشيد : از برف تا يخ فاصله ناچيز است ... اين استدلال من است .&lt;BR&gt;و باور كنيد از داغ تا يخ نيز فاصله ناچيز است . &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;3-آنقدر در خود مانده ایم و تا تو که چند قدم هم نمانده باز نمی رسیم...محاقی در خود داریم..&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;شراره جمشيد : كه خود نيز گم گشته ايم&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;4- تعبیر &quot; خواب را كـــــــــــَر شده ام &quot; خیلی ظریف و زیباست...&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;شراره جمشيد : به خوبترينها سوگند كه جز اينها نمي شنوم&lt;BR&gt;...........&lt;/DIV&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt;یازگل&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;- كبوتر &lt;BR&gt;شايد برخي به فضاي اين شعر فضايي تخيلي بگويند ولي من اين &lt;BR&gt;فضا را فضايي مي بينم كه وهم و گمان نيست و ذهن و عين همسوي&lt;BR&gt;هم گام مي نهند و نشانه هاي تصويري که وضع کننده ی واقعیت های بیرونی هستند در فهم محتوایی اين شعر زيبا دخیل است . به همراه تداعي خاطره و شايد پاره اي تجربه هاي فردي يا ااجتماعي&lt;BR&gt;2- آخرين ديدار&lt;BR&gt;اين شعر كاملا ا به يك واقعيت پرداخته ، يك واقعيت موجود كه جاي بحثي ندارد و با تمام تلخي اش&lt;BR&gt;بر مخاطب اثر مي كند .&lt;BR&gt;3- من&lt;BR&gt;با تمام كوتاهي پر است از چيستي ... نگاهم به اين شعرك زيبا نگاهي ست عرفاني . سير حركت تا ......&lt;BR&gt;آنجا كه هر كس به تفسير خود مي خواهد.&lt;BR&gt;4- كــــــَر &lt;BR&gt;درد و زيبا و عجب از اين تابلوي متضاد&lt;BR&gt;..........&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt;مریم اسحاقی&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;چه حجم بزرگی ست در این شعرهای کوتاه.&lt;BR&gt;تفسیر شعر ژرف کبوتر را با خوانش خانم نصرت دریافتم.&lt;BR&gt;شعر دوم سرما به جان می نشاند. رنگ برف است.&lt;BR&gt;شعر سوم ترکیب: « من در جا می زند» نو و دوست داشتنی ست. تصویری ملموس دارد.&lt;BR&gt;شعر چهارم:&lt;BR&gt;هیچ برای شنیدن نیست&lt;BR&gt;جز دو گوشوارم&lt;BR&gt;زوزه ی سگ پارس سگ&lt;BR&gt;خواب را کر شده ام&lt;BR&gt;شعری ست که زمزمه می شود و تکرار در دلم. چه خواب تلخی ست در این شعر.&lt;BR&gt;.........&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt;هوشنگ ملکی&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;هیچ صدایی برای شنیدن نیست/ جز صدای دو گوشوارت.&lt;BR&gt;چیزی هست که به من می گوید تو بزرگ تر از نوشته هایت هستی ، و دموکرات تر از متنی که پیش روست. &lt;BR&gt;قطعیتی که در کار است خط پررنگی بین خودت با خودت ترسیم می کند، بین خودی که در تصور من است با خودی که در تصرف من.&lt;BR&gt;...........&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt;پرستو ارسطو&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;شعرها در حال وهوای زنانگی تاب میخورند و من زن شاعر را به حسرت های&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;تا سروده هایی پرتاب میکنند که نمیدانم با کدام چشم باید بنگرم براین حجمه&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;های زیبا و غمگین حتا سرد تر از آخرین نگاه پدر که وجود مرا یخ زد.&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;شعرها از جنسی ناب بافته شده اند&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;...........&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt;کیوان اصلاح پذیر&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;در شعر کبوتر با بسامد بالای صدای س روبرو هسیتم :&lt;BR&gt;صلح سفید سرداب سیاه سرگرم سرنگ ترسم سر &lt;BR&gt;از 16 کلمه 8 کلمه با صدای س شروع میشود . یعنی یک دوم . چرا ؟ &lt;BR&gt;در شعر سوم استفاده خوبی از مقدمه شده است . تا تو راهی نیست . درجا زدن من دارای ایهام است اگر درجا زدن را به معنای ثانوی و متداول آن در نظر بگیریم میشود حرکت نکردن به سوی تو اما اگر آن را به معنای اصلی اش در نظر بگیریم یعنی من و تو یکی هستیم و رفتن من به سوی تو جز در جا زدن من نخواهد بود &lt;BR&gt;بیت اول شعر چهارم قادر به برقراری ارتباط با سایر بخش ها ی شعر نیست و خواب را کر شده ام گرچه بخودی خود زیباست اما بازهم در کلیت شعر جایی ندارد . شاید شعر همان است در میانه آمده . زوزه ی گرگ و پارس سگ دو گوشوار شاعرند . هردو آویزه ی گوش یکی مهاجم و دیگری مدافع اما هردو از یک جنس . شخصیتی که از یکطرف تهاجم را آموخته است و از طرف دیگر دفاع را . شاید به دلیل همین تناقض کرد شده است بنابراین خواب را کرشده ام به کلیت شعر بازمی گردد و جایگاه خود را پیدا میکند .&lt;BR&gt;.............&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt;شراره جمشید / برای جناب آقای اصلاح پذیر&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;1-با سين ِ نوستالژي ِ اين واژگان انتخابي خود چه مي كردم ؟&lt;BR&gt;شايد اگر اين بسامد بالا از فرازبه فرود مي رسيد تصوير ذهنم را&lt;BR&gt;اين طور راحت با چيدن ِ سين ها ، نمي توانستم قاب بگيرم .&lt;BR&gt;نیما می گوید : « با ذهن خود بیندیش ، با نگاه خود ببین و با زبان خود بگو /&lt;BR&gt;من نيز چنين كرده ام . البته جا بجا&lt;BR&gt;ديده ام / نوشته ام / انديشيدم كه : همان است كه مي خواستم بگويم .&lt;BR&gt;اين شعر خود ِ آني ست كه ديده ام . حتي نخواستم بازي ِ زباني با كلماتم&lt;BR&gt;داشته باشم . اين شعر فقط من هستم و زاويه ي ديد ِ من و آن : سفيد و سرداب و &lt;BR&gt;سرگرم و سرنگ و ترسي كه سَر مي رفت و مي رفت . و اين سين ديگري حاصلش بود :&lt;BR&gt;سين ِِ تسليم . اين شعر فرزند مشروع ترس است .&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;انطباق بافت شعرم و بافت ذهني ِ من بي سين ميسر نمي شد . ولي هرگز اين بسامد بالا&lt;BR&gt;را انكار نمي كنم و با نظرتان موافقم .&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;2- ايهام ِ درجا زدن ِ « من » عامدانه است . مخاطب براي خود تعبير كند و تعبيرش عزيز&lt;BR&gt;و من اما تعبيرم يكي ست / آن من و اين من .......&lt;BR&gt;3- چه زيبا تفسير كرديد اين تضاد را : هردو آویزه ی گوش یکی مهاجم و دیگری مدافع اما هردو از یک جنس . شخصیتی که از یکطرف تهاجم را آموخته است و از طرف دیگر دفاع را......&lt;BR&gt;نا گفته نماند كه شراره جمشيد سالهاست به مدارا با هجوم مي پردازد . از بس كه روزگار درد &lt;BR&gt;و فراق نصيبم نموده است . و باز هم موافقم با اين كه مي گوييد :&lt;BR&gt;شاید به دلیل همین تناقض کرد شده است بنابراین خواب را کرشده ام به کلیت شعر بازمی گردد و جایگاه خود را پیدا میکند.&lt;BR&gt;سعادتي ست بر من كه مرا خوانديد و با ظرافت به نوشتارم پرداختيد . اميد كه هميشه بهره ي نكته سنجي&lt;BR&gt;شما نصيبم گردد.&lt;BR&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt; ........&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt;عاشوری رو دشتی&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;شعرهای هایکویی ات را خواندم که پیشتر از هایکو باید طرح نامیدشان لیکن فرصتی برای حضور فرم در شعرت مهیا نساختی و این از اشکالات شعرت است.فرم شعر یک نحو جداناپذیراست که هوبت شعری ات را اشکار می سازد.با ساختن این هویت به شعرت جان تازه ای و جاودانه می بخشی.با این حال مغز این طرح ها پر بودند از حرفهای بزرگ.واین تازه ابتدای شعراست که تو را متمایز می سازد.موفق باشی.&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt;شراره جمشید :&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;ممنونم ار توجه شما &lt;BR&gt;من که خودم شباهتی بین طرح ها با هایکو نمی بینم .&lt;BR&gt;هایکو قوانین خاص خود را دارد که نوشتار من عاری از هر گونه&lt;BR&gt;قانون هایکو ییست . طرح است نوشتار ی از این دست که من می نویسم .&lt;BR&gt;و اگر طرح ترکیب است که هست ، ترکیب من مختص بمن است .&lt;BR&gt;این ساختار من است .&lt;BR&gt;من هرگز نمی توانم همانند سازی کنم . یعنی همه چیز را عاریه بگیرم .&lt;BR&gt;دلم می خواهد طرح هایم همان تصویری باشند که خود می بینم. &lt;BR&gt;منظورم این است که انگار بگوییم چون فریدا کالو شبیه به دالی نقاشی نمی کند /&lt;BR&gt;پس نقاش خوبی نیست یا بالعکس .ولی ضابطه ها را برای ارزش نهادن هرگز رد نمی کنم .با نظر شما راجع به هویت بخشیدن به شعرم موافقم . &lt;BR&gt;تا چه پیش آید و آیا سیمیای کلام نصیب من خواهد شد یا که خیر .&lt;BR&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;.............&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt;سیتکا&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;1&lt;BR&gt;شعرتان تصویر قاطعی از واژه هایی است که در سروده به کار برده اید. کبوتری را می بینم با تردید از زیر بار تعهدش شانه خالی می کند. و بهانه ای سست برای آرامش نداشتن . و نمود آشکار زنانی است که ناخواسته آنی نمی شوند که &lt;BR&gt;هستند .&lt;BR&gt;............&lt;BR&gt;2&lt;BR&gt;شعر دومتان آنقدر کوتاه و عمیق بود که &quot; باید در مورد آنچه نمی توان به زبان آورد ، خاموشی پیشه کرد . &lt;BR&gt;.............&lt;BR&gt;3&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;من در جا می زند . یاد این بیت افتادم :&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&quot; بی دلی در همه احوال خدا با او بود &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;او نمی دیدش و از دور خدایا می کرد &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;........&lt;BR&gt;4&lt;BR&gt;شاعر در این شعر به مکاشفه می اندیشد به صدایی که در ماورایی بس شگرف به شنیدنش گوش را گوشواره ای آویخته تا غیر از &quot; او &quot; نشنود&lt;BR&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt;شراره جمشید :&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;دوست عزیز&lt;BR&gt;حضور پربارتان را ارج می نهم .&lt;BR&gt;شعر 1 که توصیف من از کبوتر است شاید درونمابه ای فوویسم &lt;BR&gt;به خود دارد که این شعر را در نظر اولیه جسارتی بر نماد زیبای&lt;BR&gt;کبوتر نشان می دهد .چه جالب است که شما تعبیری جدید از آن داشتید .&lt;BR&gt;برایم خوشایند است .&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;3- در کنارمنیت اجتماعی یک من دیگر وجود دارد که عظیم وباشکوه ست وما ازآن غافلیم ولی امکان پرورشش وجود دارد وهمین بعد از وجود ماست که تعبیر به گوهر و حام جهان نما شده ا ست وخاصیت مسیحائی دارد وبقول حافظ بیهوده از بیگانگان آنرا طلب میکنیم اهل معرفت مانند خود حافظ کم وبیش این حالات والا را احساس کرده اند وابنگونه غزلیات ازین ممر برخاسته است...:&lt;BR&gt;&quot; بی دلی در همه احوال خدا با او بود &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;او نمی دیدش و از دور خدایا می کرد &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;رهائی از این منیت (نفس) ورسیدن به “من دیگر” است که گذشتن ازمنیت فعلی و راهیا بی به ورای آن است جای تلاش و جهد دارد که در هر کس به فراخور موجودیت&lt;BR&gt;وی و نوع افکارش متفاوت است .&lt;BR&gt;4 - می خواهم که جز ( او ) نشنوم .......&lt;/P&gt;
&lt;P&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P&gt;ـــــــــــــــــــــــــــــــ&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;استاد جلـــــيل قيـــــــــصـــــــري&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;سلام ...&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;شعر کبوتر بار و توجیهی روانشناسانه دارد خطره ای تلخ که بنا به زیادت تلخی و ناگواری به نا خود اگاه پس رانده شده است و پس رانده های نا خوداگاه در خواب و رویا و شعر نمود پیدا می کنند چون شعر هم مثل خواب و رویا وسیله ای است برای تعدیل و ازاد سازی و زایمان نا خود اگاه و با زایش این رانده ی تلخ و در د اورر است که راوی -زاینده آرام می شود ...کبوتر که نماد صلح و ازادی و پیام اوری و معصومیت و...است با خاطره ی تلخی از راوی گره خورده است چیزی که در روانشناسی به ان ptsd یا در تعریفی اختلال همیشه ی پی از ضربه ی روحی می گویند و باعث کابوس - بی خوابی -تحریک پذیری و افسر دگی می شود ...بسامد بالای -س-نا خوداگانه است و به خاطر تلخی و طاقت فرسایی صحنه ای است که از دریچه دیده شده است&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;با مصرع -یک دریچه نگاه -انگار تمامت راوی خود دریچه شده بود برای نگاه ان صحنه ی تکان دهنده و خاص و بسامد -س- صدای سایش دندان ها را هم تداعی می کند و پایانه ی خوب - با کبوتر ترسم سر می رود -که انگار دیدن منظره ی ناگوار با بر خاستن کبوتر و یا فوج کبوتران همراه است که به سر و صورت راوی می خورند و از سرش می گذرند (تصویر )و یا ترسی که راوی در ان غرقه می شود و این ترس از راوی سر ریز می کند شعر دوم هم از خاطره ای تلخ بر می اید گمان می کنم این شعر را می شود زیر ساختی تر کرد (لازم به گفت است اگرچه برخی از این شعر ها به عنوان شعر کوتاه پسند زیبایی شناسانه ی مرا انچنانکه باید در جزئیت مجاب نمی کنند اما همه مفاهیم عمیقی دارند &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;شعر سوم جمع نقیض است در کلیت خود 1-تا وقتی که تو راهی برای عبور نیستی من در ایستایی ام و در جا می زنم 2-جای و پناه و مأمن من تو هستی و در تو ایستاده ام 3-اگرچه به تو نزدیک اما دورم و فرصت عبور نمی دهی شعر چهارم ضمن &lt;BR&gt;احتساب مواردی که آقای اصلاح پذیر فرمودند این همانی دو گوشواره هم هست با گرگ و سگ دو گوشواره ای که یکی گرگ است و دیگری سگ راوی اما زنی است شقه شقه در مکان و زمان و تاریخ خاص که پارس سگ و صدای گرگ گوشواره ی دو گوشش تعبیه شده اند&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;در کنایت و فرهنگ خودی داریم گوشواره های گوش کنایه از نزدیک ترین کسان به شخصند در اینجا سگ و گرگی که از یک جنس اما پارادوکسند گوشواره های گوش زن-راوی هم هستند گوشواره هایی که نزدیک ترینِ دورند یا دور ترینِ نزدیک(بنا به سرشت درد پذیری زن شرقی - ایرانی )و...این نماد های متضاد نماد از انسان هایی هستند که در اینجا به صورت سگ و گرگ مجسم شده اند .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;براي استاد قيصري&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;شراره جمشيد :&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;ابتدا از شما و تمامي دوستاني كه وقت صرف كرده اند تا كلامم را خوانده و تفسير كنند بسيار ممنونم .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;استاد فرهيخته&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;چه زيبا با كبوتر و پَرپَر زدنش به احساس من پرداخته ايد .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;گويي تمام تلاشتان را براي بازسازي ايماژِ ذهن ِ من نموده ايد و دريغ نكرده ايد .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;نزديكترين تفسير به افكارم درباره كبوتر/  همانا اين نوشتار  شماست كه تمامي تلاش خود را براي&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;درك آن نموده ايد . مگر مي شود شاعري / شعري بنگارد و با خود ِ جان و روح و خاطرات و افكار &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;وي نزديكي نداشته باشد .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;بسيار عالي &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;و در مورد مقوله ي زيبايي شناختي / درك مي كنم كه منظورتان چيست . اميد كه با مفاهيم زيبا شناسي و گنجاندن آن در شعر تلاشي بيشتر كنم .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;تفسيرتان در باره سومين شعر نيز بسيار تعبير زيبا و متفاوت بود كه برايم جاي تامل ويژه اي دارد .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;چهارمين شعر را كه كاملا به موردي اشاره كرده ايد كه زيركي و هوش سرشار شما استاد عزيز&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;در امر شعر و گشودن گره ها مي رساند كه اين باز خود  مبحثي ويژه است كه در اين جا شايد مجال پرداختنش اندك است . هر لحظه كه مي گذرد ارتباط با عنوان بلاگم عميق تر مي شود و در اين گفته ي&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;وزين ِ ( نرودا ) ديگر نمي توانم ترديدي كنم . &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;از حضور شما استاد ارجمند و فروتن  نهايت تشكر را دارم . رهنمودهای شما چراغيست بر سر در ِ اين خانه..&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;اميد است كه هماره فروزان و درخشنده  بماند .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;STRONG&gt;احمد موسوی&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;دوست دارم کمی در خصوص زبان در این شعر کمی گفتگو کنم. زبان را در گذشته این گونه تعریف می کردند. زبان دستگاهی است از علائم آوایی قراردادی که برای ارتباط بین افراد یک اجتماع به کار می رود. مطالعه زبان تاریخ بس طولانی دارد گاهی برخی دیگر نیز زبان را این گونه تعبیر کرده اند زبان بهترین آیینه ذهن بشر است (لایب نیتس) برخی دیگر به طور کل ذات زبان پديدارگري‌ می دانند. زبان «جهان» را براي ما مي‌گزارد و چيزها و نسبت هاي ميان چيزها و چند و چون شان را پديدار مي‌كند. «جهان» خود آن در هم تنيدگيِ ذهن و عين است كه ذهن و عين خود در درونِ ان و به اعتبار يكديگر وجود دارند و «جهان» نيز خود همان اندازه ذهني‌ست كه عيني، يعني «جهان» همان اندازه به اعتبار ذهن نگرنده به آن وجود دارد كه ذهن نگرنده و معنا كننده به اعتبار جهان و همچون جزيي از آن و نيز همچون مركزِ دايره‌يِ آن. ازينرو، يك زبان يگانه كه ميانگير ذهنيت و عينيت باشد، در كار نيست، زيرا چنين رابطه‌اي كه ذهنيت و عينيت را مطلق كند و رويارويِ هم قرار دهد، رابطه‌اي‌ست انتزاعي. هر زبانی برداشت گویندگان خود را از واقعیت به طور متفاوتی تقسیم می کند زبان تنها شرط و تنها عامل مؤثر در فعالیت های عالی ذهن چون تفکر نیست ولی شاید مهمترین عامل باشد زبان تنها شرط و تنها عامل موثر در تفکر و دیگر فعالیت های ذهنی نیست ولی به میزان معجزه آسایی بالا می برد تا جاییکه می توان گفت تفکر و استدلال در مراحل عالی و بسیار مجرد از زبان غیرقابل تجزیه است. در این مراحل، تفکر یعنی زبان و زبان یعنی تفکر: با کبوتر /ترسم سر می رود یا آخرین دیدار / پدر سرد بود ، خواب را کر شده ام.&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;اما نگرش به زبان و پیچیدگی های آن امروزه دیگر آن نگرش کهن نیست و خیلی ها زبان را محل زایش خود زبان می دانند. اما در این جا با سادگی (می توان گفت سادگی) واژه ها رو به رو هستم. خیلی ها فکر می کنند چنین موضوعی شاید سبب ضعف شاعر باشد اما اگر رابطه زبان و تفکر را در نظر بگیریم به کار گیری زبان در بیان مفهوم و تفکر حایز اهمیت می شود اما در کنار آن این نکته نیر نباید فراموش شود که زبان در شعر نباید آن قدر تحت تأثیر تفکر رود که با متنی شعر زده و ژورنالیستی مواجه شد. اولین تاثیر زبان به عنوان یک دستگاه علایم این است که ما را از قید زمان و مکان آزاد می کند و میدان فعالیت اندیشه ما را به طورنامحدودی میگستراند. اگر توانایی ما به این منحصر بود که فقط در مقابل پدیده های طبیعی واکنش کنیم و نه در مقابل علایمی که به آنها دلالت می کنند، فقط می توانستیم در مقابل آنچه در زمان و مکان موجود است وحواس ما را متاثر می کند عکس والعمل نشان دهیم و این همان کاری است که حیوانات می کنندزبان به عنوان یک دستگاه علایم به ما این توانایی را می دهد که جنبه های مختلف یک پدیده واحد را تجزیه کنیم. فرک می کنم در این قطعات زبان می توانست کمی از این حالت سکون به در آید البته نه در حد بسیار افراطی آن که گاهن در برخی از شعر دوستان شاهد آن هستیم. (البته این هم بسته به خود شاعر است که زبان را چگونه به عنوان ابزاری برای بیان تفکر و سرایش به کار می گیرید.) &lt;BR&gt;با احترام.&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;&lt;STRONG&gt;شراره جمشید / برای آقای موسوی:&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;سپاس از وقتي كه صرف كرده ايد . به وجه اساسي و مهمي پرداخته ايد . &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;و از زاويه ي جالبي به شعر ِ من دريچه گشوده ايد .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;زبان و تفکر در واقع آن‌چنان سخت به هم جوش می‌خورند که گاه تميز اين دو از هم دشوار&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;مي نمايد . به ديد ِ من فكر در قالب كلمه  گويي تمامي  تصوير هاي ذهني و احساس را انتقال مي دهد .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;اين جاست كه زبان يك نوع جهان بيني ِ خاص بر گويندگان خود تحميل مي كند . &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;افلاطون معتقد بود كه هنگام تفكّر، روح انسان با خودش حرف مى‏زند.. و بالعکس این نظریه نیز&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;موجود است .من در اين مبحث مبتدي هستم و احاطه اي بر كل اين رابطه زبان و تفكر از بُعد علمي &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;آن ندارم ولي اين را مي دانم كه ، نيرو و توان مفهوم سازي ِ ذهن ِ ما بي انتهاست . تا بدانجا&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;كه از مفهومي كه خود مثلا انتزاعي ست باز قادريم مفاهيمي انتزاعي تر خلق كنيم .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;تفكر صرفاً در قالب كلمات و جملات صورت نمى‏گيرد و با نوعى تصويرگرى همراه است كه شدت و ضعف آن در افراد مختلف متفاوت است.  منظورم استفاده از قوه ي ِ تخيل است . يعني توانا يي ِ تجسم ، حتي&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;تجسم چيزي كه موجود نيست يا اصلا تابحال مشاهده نكرده ايم .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;اين است كه اين رابطه خود را در شعر بارز مي كند و رها در واژه ها مي نشيند و هر كس به نوعي&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;رابطه را درك مي كند .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;ديدگاه تان محترم و با ارزش است برايم . اميد كه اين حضور تداوم يابد براي گامي به پيش رو و درك&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;بهتر واژه ها  ....&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P&gt; &lt;A href=&quot;http://www.hojum.com/index.php?option=com_content&amp;task=view&amp;id=170&amp;Itemid=49&quot;&gt;ياداشتي از شراره جمشيد &lt;/A&gt;در هجوم&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;A href=&quot;http://shararejamshid.blogfa.com/post-1.aspx&quot;&gt;منتخبي از مجموعه شعر « در خنكاي عصري دور » به قلم : خانم مهري پورهاشميان&lt;/A&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;A href=&quot;http://shararejamshid.blogfa.com/post-11.aspx&quot;&gt;&lt;B&gt;Mary Stevenson Cassattنقاش آمریکایی&lt;/B&gt;&lt;/A&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;A href=&quot;http://shararejamshid.blogfa.com/post-3.aspx&quot;&gt;&lt;STRONG&gt;«ني‌زن، جذامي و باد» &lt;/STRONG&gt;&lt;/A&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;/P&gt;
&lt;DIV&gt;&lt;A href=&quot;http://shararejamshid.blogfa.com/post-14.aspx&quot;&gt;&lt;STRONG&gt;سارای /آپاردي سئللر ساراني&lt;/STRONG&gt;&lt;/A&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV&gt; &lt;/DIV&gt;
&lt;DIV&gt;&lt;A href=&quot;http://shararejamshid.blogfa.com/post-19.aspx&quot;&gt;&lt;STRONG&gt;دو نقاشی زیبا از پدرو آلوارز ( آرژانتین و تانگو )&lt;/STRONG&gt;&lt;/A&gt;&lt;/DIV&gt;</description>
<pubDate>Tue, 12 May 2009 10:56:18 GMT</pubDate>
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</item>
<item>
<title>شعر / شراره جمشید </title>
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<description>  
&lt;P&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;  
&lt;HR&gt;
&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; ۱&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; ( پازََن )&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;كبك  چشم كه پريد /&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;يك جفت لاله  ســـــــــر رفتم /&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; شور  .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;تلخ ِِ  دهانم /&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;پياله ي دوغ و &lt;STRONG&gt;خاري&lt;/STRONG&gt; . . .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;تنگِ اِشكَفت /&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;گُرده ي سنگ / &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;جُم جُم برگ بلوط ،&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;خوابم كرد .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;آخرين پازَن&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;طلوع آمد در صعــــــــــود  /&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;                      &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;ت‌ـــــــــيري&lt;/STRONG&gt; كه رفت ، خوابم رمـــيد .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;پازَن آرام نشسته بود  /&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;شرم مي رفتم در نگاهش ...&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;سالها / &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;با شاخهايــــــــــــــش &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;زخمم مي زند بر اين ديــــــــــــوار.&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;&lt;STRONG&gt;نويسنده : شــــــــــــــــــــــــراره جمشيـــــــــد 3/6/86&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;خاري : گياهي كوهي كه با دوغ خورده مي شود&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;
&lt;P&gt;  اِشكَفت  : غار کوچک&lt;/P&gt;
&lt;P&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P&gt;
&lt;P&gt;                ۲   ........................................................................................&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt;منگ آیین منگ&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;/STRONG&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P&gt;عطسه ها ي جوان&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;عرضه ي &lt;STRONG&gt;سرخ&lt;/STRONG&gt; لب .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; سرفه ي پير پير&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;چند دندان زرد  .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;  سيگار بار زده&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;تراكم گيج ابر .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; نطقهاي كور&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; با دهان فلسفه .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;  صرف قهوه ي تلخ ،&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; مسخ دود&lt;STRONG&gt; ( دن خوان )&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;STRONG&gt;منگ &lt;/STRONG&gt; آيين&lt;STRONG&gt;  منگ .&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; اين منم ، يا كه&lt;STRONG&gt; تو&lt;/STRONG&gt;  &lt;STRONG&gt;؟&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;اين تويي ، يا كه &lt;STRONG&gt;من ؟&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; بر دو راه  ، شرق و غرب &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;نشانه ها شكسته بود .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; هرچه هست ، هر چه نيست &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;حرف تازه اي نبود ...&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;نويسنده : شراره جمشيد &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt;پی نوشت :&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; عرفان های امریکایی و سرخپوستی(بیشتر برخاسته از مکزیک):&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl&gt; ( دن خوان ) مرشدِ کارلوس کاستاندا ، با نام کامل دون خوان ماتیوس ( Don Juan Matus )&lt;/P&gt;
&lt;P&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P&gt; دکتر &lt;I&gt;&lt;STRONG&gt;سیمین دانشور&lt;/STRONG&gt;&lt;/I&gt; متولد8 اریبهشت 1300 هجری شمسی &lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt;( میلادت مبارک بانو )&lt;/STRONG&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P&gt;  
&lt;HR&gt;

&lt;P&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT color=#993399&gt;نوزاد&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P&gt;لرزش های نوزاد&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;بر صورت زن&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;از میان آنها جهان بی صدا&lt;/P&gt;
&lt;P&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P&gt;هر شب از من می افتادی&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;درون آنچه می خزد&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;بزیر پوست تیره ی سوسک ها&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;شکم لرزان عنکبوت&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;حاشیه ی آبی شیری چراغ خیابان&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;که اتاق را تقسیم می کرد&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;من تو را در سمت خودم نگاه داشتم&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;و جانوران از میان دستم خزیدند&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;خورندگان کوچک&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;کنار نرمای میرندگی&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#993399&gt;&lt;STRONG&gt;می خواستم همچنان تو را  زیر پوست خودم حمل کنم&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#ff0000&gt;(  &lt;FONT face=Arial&gt;رونه فلت  )&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;  
&lt;HR&gt;

&lt;P&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;اردیبهشتی ها : ادامه مطلب&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Tue, 28 Apr 2009 18:29:18 GMT</pubDate>
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<item>
<title>دوستان</title>
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&lt;DIV class=SideTitleClass id=L_Title_0 style=&quot;DISPLAY: block; FONT-WEIGHT: bold; FONT-SIZE: 1em; BORDER-LEFT-COLOR: #333; BORDER-BOTTOM-WIDTH: 1px; BORDER-BOTTOM-COLOR: #333; COLOR: #000; BORDER-TOP-COLOR: #333; BORDER-RIGHT-COLOR: #333&quot;&gt;دوستان&lt;/DIV&gt;
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&lt;DIV id=L_LinkBodyContainer_0_0 style=&quot;DISPLAY: block&quot;&gt;&lt;SPAN id=L_LinkPreSurr_0_0&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN id=L_LinkBodyButText_0_0 style=&quot;DISPLAY: none&quot;&gt;دختر حوا . الهه ی عزیز&lt;/SPAN&gt;&lt;A id=L_LinkBody_0_0 title=&quot;Hallucinations Of Reabsorbed Mind&quot; style=&quot;DISPLAY: inline&quot; href=&quot;http://dokhtar-e-havva.blogfa.com/&quot;&gt;دختر حوا . الهه ی عزیز&lt;/A&gt;&lt;SPAN id=L_LinkPstSurr_0_0&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/DIV&gt;
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<pubDate>Sat, 18 Apr 2009 00:49:18 GMT</pubDate>
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<pubDate>Sat, 11 Apr 2009 22:02:18 GMT</pubDate>
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